UCC News: अधीर रंजन चौधरी बोले- राज्यों नहीं, केंद्र बनाए यूनिफॉर्म सिविल कोड पर राष्ट्रीय कानून

UCC News:  यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर देश में एक बार फिर राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। हाल ही में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद अधीर रंजन चौधरी ने इस संवेदनशील विषय पर अपनी राय स्पष्ट करते हुए केंद्र सरकार को एक महत्वपूर्ण सुझाव दिया है। मुर्शिदाबाद में पत्रकारों से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि यदि सरकार पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू करना चाहती है, तो इसे टुकड़ों में नहीं, बल्कि केंद्रीय स्तर पर एक व्यापक राष्ट्रीय कानून के रूप में लाया जाना चाहिए।

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भारत की विविधता और यूसीसी की संवेदनशीलता

अधीर रंजन ने इस बात पर जोर दिया कि भारत एक ऐसा देश है जो अपनी विविधता, अलग-अलग संस्कृतियों, भाषाओं और जीवनशैली के लिए जाना जाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यूसीसी का संबंध आपराधिक कानूनों से नहीं, बल्कि शादी, तलाक, संपत्ति और उत्तराधिकार जैसे दीवानी मामलों से है। उन्होंने सरकार को आगाह किया कि कोई भी कानून बनाने से पहले देश के बहुरंगी ताने-बाने का सम्मान करना अनिवार्य है। उनका मानना है कि इस प्रक्रिया में किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय को यह महसूस नहीं होना चाहिए कि उन्हें हाशिए पर धकेला जा रहा है।

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अलग-अलग राज्यों में यूसीसी पर जताई चिंता

अधीर रंजन चौधरी ने विशेष रूप से भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों, जैसे कि उत्तराखंड, गुजरात और असम में अलग-अलग यूसीसी कानून पारित करने की प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त की। उनका तर्क है कि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नियमों के साथ कानून बनाने से एक तरह की भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। कांग्रेस नेता को इस बात का डर है कि इस तरह के बिखरे हुए कानूनों से अल्पसंख्यकों के अधिकारों के हनन का खतरा बढ़ सकता है, जो देश की सामाजिक एकता के लिए अच्छा नहीं है।

पश्चिम बंगाल में यूसीसी की तैयारियों का असर

अधीर रंजन का यह बयान ऐसे समय पर आया है जब पश्चिम बंगाल में यूसीसी को लेकर तैयारियां जोरों पर हैं। राज्य सरकार ने जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में 9 सदस्यों की एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया है। इस समिति का मुख्य कार्य यूसीसी का एक विस्तृत ड्राफ्ट तैयार करना है। राज्य सरकार की योजना है कि इस प्रस्तावित कानून को आगामी अगस्त सत्र में विधानसभा के पटल पर रखा जाए। हालांकि, सरकार ने संकेत दिए हैं कि इसमें आदिवासी समुदायों के हितों और उनकी परंपराओं को सुरक्षित रखने के लिए विशेष छूट दी जा सकती है।

राजनीतिक भविष्य और बढ़ता सियासी पारा

कांग्रेस नेता के इस बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले समय में यूसीसी का मुद्दा संसद से लेकर विभिन्न राज्य विधानसभाओं तक जोरदार बहस का केंद्र रहने वाला है। एक ओर जहां राज्य सरकारें अपने स्तर पर तैयारी कर रही हैं, वहीं विपक्ष इस पर केंद्र की एक स्पष्ट राष्ट्रीय नीति की मांग कर रहा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस दिशा में क्या रुख अपनाती है और क्या वाकई एक राष्ट्र-व्यापी कानून की नींव रखी जाएगी या यह राज्यों के बीच एक और राजनीतिक विवाद का विषय बना रहेगा।

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Chandan Das

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