Chhattisgarh Assembly : छत्तीसगढ़ विधानसभा के बजट सत्र के चौथे दिन की कार्यवाही काफी हंगामेदार रही। सदन में सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच मछुआ नीति, तालाब पट्टा आवंटन में कथित अनियमितताओं और खाद भंडारण की व्यवस्था को लेकर जोरदार बहस देखने को मिली। विपक्ष ने सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए कई गंभीर आरोप लगाए, जबकि सरकार की ओर से संबंधित मंत्री ने स्थिति को स्पष्ट करने का प्रयास किया। विधानसभा की कार्यवाही के दौरान मछुआरा समुदायों के अधिकारों और राज्य में कृषि इनपुट के प्रबंधन को लेकर हुए इन सवालों ने सदन का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।

मछुआ नीति और पट्टा आवंटन में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप
विधायक कुंवर सिंह निषाद ने सदन में मछुआरा नीति के अंतर्गत पट्टा आवंटन में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं का मुद्दा उठाया। उन्होंने बताया कि राज्य में 25 लाख मछुआरा परिवार निवासरत हैं, लेकिन वर्तमान नीति के तहत पट्टा देने में भारी धांधली हो रही है। कुंवर सिंह निषाद ने आरोप लगाया कि जांजगीर जिले में नियम विरुद्ध तरीके से गैर-मछुआ समाज के लोगों को और अल्पसंख्यकों को तालाब पट्टे आवंटित किए गए हैं। उन्होंने दावा किया कि बलोदा मछुआ सहकारी समिति, जो पिछले 39 वर्षों से वहां कार्यरत है, उसे नजरअंदाज कर दिया गया। इतना ही नहीं, जब वास्तविक हकदारों ने अपना अधिकार मांगा, तो उन पर उल्टे एफआईआर दर्ज कर दी गई।

2022 की नीति पर सरकार का रुख और बचाव
विधायक के आरोपों पर जवाब देते हुए कृषि मंत्री रामविचार नेताम ने स्पष्ट किया कि वर्तमान में 2022 की मछुआ नीति प्रभावी है और उसी के अनुसार पट्टा आवंटन की प्रक्रिया पूरी की गई है। मंत्री ने जोर देकर कहा कि उनकी सरकार किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं कर रही है। जिन शिकायतों का उल्लेख विधायक ने किया, उनके संबंध में संबंधित जिला कलेक्टरों द्वारा जांच रिपोर्ट मंगवाई गई थी और मामले का निराकरण उसी के अनुरूप किया गया है। हालांकि, मंत्री ने यह भी आश्वासन दिया कि यदि सदस्य को जांच प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की विसंगति महसूस होती है, तो सरकार दोबारा उच्च स्तरीय जांच कराने के लिए तैयार है।
विधानसभा जांच समिति बनाने की मांग और विवाद
कुंवर सिंह निषाद ने मंत्री के जवाब से असंतुष्ट होकर मांग की कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के लिए एक विशेष विधानसभा समिति का गठन किया जाए और उन्हें उस समिति का सदस्य बनाया जाए। उन्होंने पट्टा आवंटन की समय-सीमा पर भी सवाल उठाए। निषाद ने बताया कि यदि ग्राम समिति किसी आवेदन पर 6 महीने तक निर्णय नहीं लेती है, तो वह स्वतः ही निरस्त हो जाता है, लेकिन यहां 18 महीने बाद पट्टा जारी किया गया है। मंत्री रामविचार नेताम ने कहा कि विभाग किसी को भी तालाब आवंटित नहीं करता है, यह प्रक्रिया नियमानुसार होती है। उन्होंने वादा किया कि यदि किसी समिति के साथ वास्तव में नाइंसाफी हुई है, तो उन्हें तालाब आवंटित किए जाएंगे।
वन अधिकार अधिनियम और आदिवासियों के हक का मुद्दा
नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत ने एक महत्वपूर्ण तकनीकी और संवैधानिक मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत वन क्षेत्र में आने वाले तालाबों पर वहां के स्थानीय निवासियों का अधिकार है। उन्होंने आरोप लगाया कि मछुआ नीति 2022 में खामी है, जिसके कारण आदिवासियों को उनके जल-क्षेत्रों से बेदखल किया जा रहा है। नेता प्रतिपक्ष ने सरकार से मछुआ नीति में एक लाइन के संशोधन की मांग की, ताकि आदिवासी समुदायों के अधिकारों को सुरक्षित किया जा सके। मंत्री ने इसके जवाब में कहा कि यह नियम पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में बना था, लेकिन वे आदिवासियों के हित के लिए एक नई नीति पर काम कर रहे हैं और जल्द ही कमियों को दूर किया जाएगा।
खाद भंडारण पर भिड़े पक्ष-विपक्ष, केंद्र पर डाला दारोमदार
अंत में, कांग्रेस विधायक दलेश्वर साहू ने प्रदेश में खाद की अनुपलब्धता और भंडारण में अव्यवस्था का मुद्दा उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि जिन जिलों में खाद की मांग कम है, वहां बेवजह भंडारण किया गया है और निजी खाद भंडारण को बढ़ावा दिया जा रहा है। इस पर मंत्री रामविचार नेताम ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि राज्य में 14 लाख मीट्रिक टन से अधिक खाद का भंडारण सुनिश्चित किया गया है। उन्होंने कहा कि बस्तर और सरगुजा जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में इस बार पर्याप्त खाद पहुंचाई गई है। मंत्री ने स्पष्ट किया कि खाद की रैक कहां जाएगी और कितनी आपूर्ति होगी, यह पूरी तरह से केंद्र सरकार के नियंत्रण में है, राज्य केवल अपनी मांग भेजता है।












