E20 Petrol : देशभर में पेट्रोल के साथ 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण यानी ई-20 ईंधन को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच रायपुर से एक बेहद महत्वपूर्ण मामला सामने आया है। रायपुर के एक उपभोक्ता अदालत ने ई-20 ईंधन के कारण कार के इंजन में आई तकनीकी खराबी को लेकर ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। उपभोक्ता फोरम ने मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड और उसके अधिकृत डीलर को सेवा में कमी और अनुचित व्यापारिक व्यवहार का दोषी पाया है। यह देश का पहला ऐसा मामला है जहाँ अदालत ने स्पष्ट माना कि कार का इंजन ई-20 ईंधन के अनुकूल नहीं था, बावजूद इसके कंपनी ने उपभोक्ता को वाहन बेचा।

क्या है पूरा मामला और उपभोक्ता की व्यथा
इस मामले के पीड़ित किडनी रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रेमराज देवता हैं। उन्होंने जून 2024 में रायपुर की एक नेक्सा डीलरशिप से ग्रैंड विटारा स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड जेटा प्लस खरीदी थी। अपनी चिकित्सा सेवा के लिए डॉ. देवता को रोजाना 150 से 200 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है, इसलिए उन्होंने हाइब्रिड कार का चयन किया था। खरीदारी के समय उन्हें बताया गया कि कार दिसंबर 2023 में बनी है, लेकिन बाद में कानूनी दस्तावेजों से खुलासा हुआ कि वाहन का निर्माण जनवरी 2023 में ही हो चुका था। करीब पांच महीने के संतोषजनक प्रदर्शन के बाद, 11 नवंबर 2024 को कार के डैशबोर्ड पर इंजन मालफंक्शन का अलर्ट आया और वाहन बीच रास्ते में ही बंद हो गया।


डीलरशिप की जांच और बार-बार आती रही तकनीकी समस्या
कार बंद होने के बाद जब उसे डीलरशिप पर ले जाया गया, तो वहां ईंधन में मिलावट की बात कहकर टैंक खाली किया गया। निकाले गए ईंधन में नीचे की ओर सफेद पदार्थ जमा मिला। डॉ. देवता ने इसकी शिकायत पेट्रोल पंप और कंपनी से की, लेकिन पंप पर हुई जांच में ईंधन को मानक के अनुरूप बताया गया। इसके बावजूद कार की समस्याएं कम नहीं हुईं। कंपनी ने खुद माना कि पहली बार में टंकी पूरी तरह साफ नहीं हुई थी, लेकिन बार-बार सफाई के बाद भी फ्यूल टैंक, पाइपलाइन और फिल्टर में वही सफेद परत और तरल पदार्थ मिलने का सिलसिला जारी रहा। अंततः कार पूरी तरह ठप हो गई और ईवी मोड ने काम करना बंद कर दिया।
कंपनी का भारी-भरकम बिल और उपभोक्ता की हताशा
स्थिति तब और बिगड़ गई जब कंपनी ने ईमेल के जरिए डॉ. देवता को सूचित किया कि इंजन पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका है। कंपनी ने इंजन बदलने के लिए लगभग 5.30 लाख रुपए का खर्च बताया और इसे वारंटी से बाहर का विषय करार दिया। हैरानी की बात यह रही कि तकनीकी टीम द्वारा कार ठीक किए जाने के दावे के बाद भी, महज 10 किलोमीटर चलने के बाद वाहन फिर से बंद हो गया। टैंक से दही जैसी सफेद परत निकलने से उपभोक्ता पूरी तरह परेशान हो गए। नई कार के प्रतिस्थापन या पूरी राशि वापसी की मांग को कंपनी द्वारा ठुकराने के बाद, डॉ. देवता ने मार्च 2025 में कंज्यूमर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सरकारी लैब की रिपोर्ट बनी निर्णायक सबूत
इस विवाद को सुलझाने के लिए सरकारी मान्यता प्राप्त एसजीएस (SGS) लैब में ईंधन के नमूनों की वैज्ञानिक जांच कराई गई। रिपोर्ट ने मामले को एक नया मोड़ दे दिया। जांच में पुष्टि हुई कि पेट्रोल में एथेनॉल अलग होकर नीचे सफेद परत के रूप में जमा हो गया था, जिससे प्रभावी ईंधन केवल 6 से 7 प्रतिशत ही रह गया था। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि कंपनी ने ऐसा वाहन बेचा जो ई-20 ईंधन के तकनीकी मानकों के अनुरूप नहीं था। यह न केवल उपभोक्ता के साथ धोखा था, बल्कि कंपनी की ओर से एक बड़ी तकनीकी चूक भी थी।
कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश: नई कार या पूरी राशि की वापसी
14 जुलाई 2026 को उपभोक्ता फोरम ने डॉ. देवता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कंपनी को 45 दिनों का अल्टीमेटम दिया है। अदालत ने निर्देश दिया है कि यदि कंपनी 45 दिनों के भीतर उसी मॉडल की नई ई-20 अनुकूल कार उपलब्ध नहीं कराती है, तो उसे गाड़ी की पूरी कीमत (20.5 लाख रुपए), आरटीओ पंजीकरण, बीमा और अन्य सभी खर्चों का भुगतान करना होगा। इसके अलावा, आदेश की तारीख से भुगतान तक 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज, मानसिक प्रताड़ना के लिए 1 लाख रुपए और मुकदमे के खर्च के रूप में 10 हजार रुपए भी देने होंगे।
ऑटो एक्सपर्ट्स की राय: वाहनों के अपडेशन की आवश्यकता
ऑटो विशेषज्ञ के. महेश कुमार के अनुसार, एथेनॉल और पेट्रोल के घनत्व में अंतर होता है और यदि एथेनॉल में नमी हो, तो वह पेट्रोल में नहीं घुल पाता। इससे फ्यूल सिस्टम प्रभावित होता है। विशेषज्ञ का मानना है कि भारत में अभी कई वाहन ऐसे हैं जो ई-20 ईंधन के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं हैं। जैसे-जैसे ईंधन की संरचना बदल रही है, उसी अनुपात में ऑटोमोबाइल कंपनियों को अपने इंजन डिजाइन और फ्यूल सिस्टम को अपडेट करने की सख्त जरूरत है, ताकि भविष्य में इस तरह की जानलेवा और महंगी तकनीकी विफलताओं से बचा जा सके।
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