तिरुमाला मंदिर के गर्भगृह में घंटी न होने की परंपरा सदियों से श्रद्धालुओं को हैरान करती आई है। मान्यता है कि इसके पीछे एक दिव्य रहस्य और चमत्कारी बालक की कथा जुड़ी है। आखिर क्या है यह अद्भुत रहस्य, जानिए पूरी कहानी।
तिरुमाला मंदिर के गर्भगृह में घंटी न होने की परंपरा सदियों से श्रद्धालुओं को हैरान करती आई है। मान्यता है कि इसके पीछे एक दिव्य रहस्य और चमत्कारी बालक की कथा जुड़ी है। आखिर क्या है यह अद्भुत रहस्य, जानिए पूरी कहानी।

Tirumala Temple Mystery: विश्व प्रसिद्ध तिरुमाला स्थित भगवान श्री वेंकटेश्वर स्वामी (बालाजी) मंदिर अपनी भव्यता और चमत्कारों के लिए पूरी दुनिया में आस्था का केंद्र है। आमतौर पर हिंदू मंदिरों के गर्भगृह में पूजा-अर्चना के दौरान छोटी घंटियों का उपयोग किया जाता है, लेकिन तिरुमाला के मुख्य गर्भगृह में घंटी का न होना एक बड़ा रहस्य है। इसके पीछे न केवल प्राचीन ‘वैखानस आगम’ शास्त्र के कड़े नियम जिम्मेदार हैं, बल्कि एक अत्यंत भावुक और अलौकिक लोककथा भी जुड़ी है, जो महान संत श्री वेदांत देशिका से संबंधित है।


पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में द्रोथम्बा और अनंत सूर्य नामक एक दम्पति रहते थे। बारह वर्षों तक नि:संतान रहने के बाद उन्होंने भगवान वेंकटेश्वर की कठिन तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए और अपने हाथ की दिव्य घंटी प्रसाद स्वरूप द्रोथम्बा को दी। भगवान ने उन्हें वह घंटी निगलने का निर्देश दिया, जिससे उन्हें एक दिव्य पुत्र की प्राप्ति होगी। सुबह जागने पर दोनों को ज्ञात हुआ कि यह मात्र स्वप्न नहीं, बल्कि एक दैवीय आदेश था।

अगली सुबह जब पुजारियों ने मंदिर के कपाट खोले, तो गर्भगृह में लगी मुख्य घंटी गायब थी। पुजारियों को दम्पति पर संदेह हुआ, किंतु मुख्य पुजारी को ध्यान में भगवान के साक्षात दर्शन हुए। भगवान ने स्पष्ट किया कि वह घंटी उन्होंने स्वयं द्रोथम्बा को दी है और उस दिव्य अंश से एक महापुरुष का जन्म होगा। इस घटना के बाद से यह परंपरा बन गई कि तिरुमाला के गर्भगृह में दोबारा कभी कोई घंटी नहीं लगाई गई, जो आज भी श्रद्धापूर्वक निभाई जा रही है।
भगवान के वचनों के अनुसार, द्रोथम्बा और अनंत सूर्य के घर वेदांत देशिका का जन्म हुआ, जिन्हें साक्षात भगवान की घंटी का अवतार माना जाता है। बचपन से ही विलक्षण बुद्धि के धनी देशिका ने तमिल और संस्कृत में अतुलनीय ग्रंथों की रचना की। जगद्गुरु रामानुजाचार्य के पश्चात उन्हें वैष्णव परंपरा को पुनर्जीवित और सुदृढ़ करने वाला सबसे महान स्तंभ माना गया है। उन्होंने अपनी साधना से हयग्रीव देव को प्रसन्न किया और ‘हयग्रीव स्तुति’ जैसी महान कृतियां रचकर विद्वता की नई परिभाषा गढ़ी।
श्री वेदांत देशिका का जीवन अनेक चमत्कारिक घटनाओं से भरा था। उन्होंने देवी लक्ष्मी की स्तुति कर सोने के सिक्कों की वर्षा कराई। जब शत्रुओं ने चुनौती दी, तो उन्होंने एक रात में हजार श्लोकों वाला ‘पादुका सहस्रम्’ रचकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। उन पर जानलेवा हमले करने वाले शत्रुओं के विषैले सांपों को गरुड़ मंत्र के प्रभाव से गरुड़ देव ने स्वयं आकर शांत किया। मुगलों के आक्रमण के दौरान उन्होंने अत्यंत विषम परिस्थितियों में छिपकर पवित्र वैष्णव साहित्य की रक्षा की, जिससे आज भी संपूर्ण हिंदू धर्म गौरवान्वित है। उनका जीवन भक्ति और रक्षा की एक अमिट गाथा है।

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