Pregnancy Rights: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने महिलाओं के प्रजनन अधिकार और रोजगार के अधिकार को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी महिला की गर्भावस्था उसे सरकारी नौकरी से वंचित करने का आधार नहीं बन सकती। न्यायालय ने कहा कि किसी महिला को मातृत्व और रोजगार में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर करना संविधान द्वारा प्रदत्त उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। अदालत का यह आदेश महिलाओं के समान अवसर और कार्यस्थल पर उनके अधिकारों की सुरक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

यूपीएसएसएससी के फैसले को किया निरस्त
यह फैसला इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने कोमल जायसवाल द्वारा दायर विशेष अपील पर सुनाया। कोमल ने उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UPSSSC) के उस निर्णय को चुनौती दी थी, जिसमें आयोग ने उनकी शारीरिक दक्षता परीक्षा (PET) स्थगित करने की मांग अस्वीकार कर दी थी। यह परीक्षा वन रक्षक एवं वन्यजीव रक्षक भर्ती प्रक्रिया का हिस्सा थी। मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह की खंडपीठ ने आयोग के निर्णय के साथ-साथ एकल पीठ के आदेश को भी रद्द कर दिया और आयोग को चार सप्ताह के भीतर कोमल की पीईटी आयोजित करने का निर्देश दिया।

‘मातृत्व और नौकरी में से एक चुनने को मजबूर नहीं किया जा सकता’
अपने फैसले में खंडपीठ ने कहा कि गर्भावस्था के आधार पर किसी महिला की पीईटी स्थगित करने से इनकार करना वस्तुतः उसे मातृत्व और रोजगार के बीच चयन करने के लिए मजबूर करना है। अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था में स्वीकार्य नहीं हो सकती। न्यायालय के अनुसार, यह महिला के प्रजनन अधिकार के साथ-साथ उसके रोजगार पाने के अधिकार में भी अनुचित हस्तक्षेप है।
क्या था पूरा मामला?
कोमल जायसवाल ने वर्ष 2023 में वन रक्षक एवं वन्यजीव रक्षक भर्ती के लिए आवेदन किया था। उन्होंने लिखित परीक्षा सफलतापूर्वक पास कर ली थी और उन्हें फरवरी 2026 में आयोजित होने वाली शारीरिक दक्षता परीक्षा में शामिल होना था। हालांकि उस समय वह गर्भावस्था के नौवें महीने में थीं। उन्होंने आयोग से अनुरोध किया कि प्रसव के बाद उन्हें 14 किलोमीटर की पैदल शारीरिक परीक्षा देने का अवसर दिया जाए। लेकिन आयोग ने यह कहते हुए आवेदन अस्वीकार कर दिया कि भर्ती नियमों में पीईटी स्थगित करने का कोई प्रावधान नहीं है।
कोर्ट ने अपनाने को कहा मानवीय दृष्टिकोण
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि भर्ती नियमों में पीईटी स्थगित करने पर स्पष्ट प्रतिबंध नहीं है। ऐसे में आयोग को असाधारण परिस्थितियों में संवेदनशील और मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए था। न्यायालय ने यह भी कहा कि किसी महिला की वैवाहिक स्थिति या गर्भावस्था को सरकारी सेवा के लिए अयोग्यता का आधार नहीं बनाया जा सकता। यदि किसी नियम में स्पष्ट रोक नहीं है, तो प्रशासन को न्यायसंगत और व्यावहारिक निर्णय लेना चाहिए।
जीवन की सामान्य परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
खंडपीठ ने यह भी उल्लेख किया कि भर्ती विज्ञापन जारी होने और लिखित परीक्षा के बीच दो वर्ष से अधिक का समय बीत चुका था। इस दौरान विवाह, गर्भधारण और मातृत्व जैसी जीवन की सामान्य घटनाएं होना स्वाभाविक है। अदालत ने कहा कि इन परिस्थितियों के कारण किसी महिला को नौकरी के अवसर से वंचित करना समानता और निष्पक्षता के संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत होगा।
सफल होने पर सभी लाभों सहित नियुक्ति का आदेश
उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि यदि कोमल जायसवाल शारीरिक दक्षता परीक्षा, चिकित्सीय परीक्षण और अंतिम मेरिट सूची में सफल होती हैं, तो उन्हें उसी तिथि से नियुक्ति दी जाए, जिस दिन अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) महिला श्रेणी में उनसे कम मेरिट वाले अभ्यर्थी को नियुक्त किया गया था। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उन्हें नियुक्ति के साथ सभी परिणामी सेवा लाभ भी दिए जाएंगे।
भर्ती प्रक्रिया पूरी होने तक पद रहेगा सुरक्षित
न्यायालय ने आयोग को यह भी निर्देश दिया कि पूरी प्रक्रिया पूरी होने तक संबंधित श्रेणी का एक पद रिक्त रखा जाए। अदालत का मानना है कि इससे याचिकाकर्ता के अधिकार सुरक्षित रहेंगे और यदि वह सभी चयन प्रक्रियाओं में सफल होती हैं तो उन्हें किसी प्रकार का नुकसान नहीं होगा। यह फैसला भविष्य में सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं में गर्भवती महिलाओं के मामलों में अधिक संवेदनशील और न्यायसंगत दृष्टिकोण अपनाने के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।
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