Saffron Cultivation: केसर को दुनिया के सबसे महंगे और कीमती मसालों में गिना जाता है। खाने में इसकी थोड़ी-सी मात्रा ही रंग, खुशबू और स्वाद को खास बना देती है। भारत में केसर का नाम आते ही सबसे पहले कश्मीर का ख्याल आता है, लेकिन अब देश के कुछ अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में भी इसकी खेती के सफल प्रयोग किए जा रहे हैं। हालांकि, केसर उगाना आसान काम नहीं है। अनुकूल मौसम, विशेष मिट्टी, पर्याप्त मेहनत और सावधानी की जरूरत के कारण इसका उत्पादन सीमित रहता है और बाजार में इसकी कीमत काफी अधिक होती है।


कश्मीर को कहा जाता है भारत की केसर राजधानी
भारत में पारंपरिक रूप से केसर की खेती जम्मू-कश्मीर में बड़े पैमाने पर की जाती है। यहां का ठंडा मौसम और विशेष भौगोलिक परिस्थितियां इस फसल के लिए अनुकूल मानी जाती हैं। खासतौर पर पुलवामा जिले का पंपोर क्षेत्र केसर उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। पंपोर को अक्सर ‘केसर का कटोरा’ भी कहा जाता है। इसके अलावा बडगाम और श्रीनगर के आसपास के इलाकों में भी इसकी खेती की जाती है।

दूसरे पहाड़ी राज्यों में भी बढ़ी खेती
पिछले कुछ वर्षों में केसर की खेती को कश्मीर से बाहर ले जाने के प्रयास भी किए गए हैं। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में अनुकूल परिस्थितियों वाले क्षेत्रों में केसर उत्पादन के प्रयोग किए गए हैं। इन राज्यों में किसानों को ठंडी जलवायु वाले इलाकों में इस फसल की खेती के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इससे भविष्य में देश के अन्य क्षेत्रों में भी केसर का उत्पादन बढ़ने की संभावना बन सकती है।
अगस्त में लगाए जाते हैं केसर के कंद
केसर की खेती आमतौर पर अगस्त के आसपास शुरू की जाती है। इसके बाद मौसम अनुकूल रहने पर अक्टूबर के अंतिम सप्ताह या नवंबर की शुरुआत में पौधों पर फूल आने लगते हैं। केसर के फूल देखने में बेहद आकर्षक होते हैं और आमतौर पर बैंगनी रंग के दिखाई देते हैं। फूल के अंदर मौजूद लाल या गहरे नारंगी रंग के महीन रेशे ही असली केसर होते हैं। इन्हें सावधानीपूर्वक निकालकर सुखाया जाता है।
एक फूल से निकलते हैं केवल तीन रेशे
केसर की कीमत अधिक होने की एक बड़ी वजह इसका कम उत्पादन है। एक फूल से आमतौर पर केवल तीन केसर के रेशे प्राप्त होते हैं। यही कारण है कि बड़ी मात्रा में केसर तैयार करने के लिए हजारों फूलों की जरूरत पड़ती है। सामान्य तौर पर करीब 150 से 200 फूलों से लगभग एक ग्राम केसर प्राप्त होने की बात कही जाती है। फूलों को चुनने और रेशों को अलग करने की प्रक्रिया काफी मेहनत वाली होती है।

सही मिट्टी और मौसम बेहद जरूरी
केसर की खेती में सबसे बड़ी चुनौती उपयुक्त जलवायु और मिट्टी उपलब्ध कराना है। पौधे को ठंडा और अनुकूल मौसम चाहिए होता है। साथ ही खेत में जल निकासी की अच्छी व्यवस्था होना बेहद जरूरी है। जमीन में जरूरत से ज्यादा पानी या नमी जमा होने पर केसर के कंद सड़ सकते हैं और इससे पूरी फसल को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है। इसलिए खेती शुरू करने से पहले खेत और जलवायु का सही आकलन करना जरूरी होता है।
हाथों से होती है केसर की सावधानीपूर्वक कटाई
केसर की कटाई सामान्य फसलों की तरह मशीनों से आसानी से नहीं की जाती। फूलों को आमतौर पर सुबह के समय हाथ से तोड़ा जाता है। इसके बाद फूलों से बेहद सावधानीपूर्वक केसर के महीन रेशे निकाले जाते हैं और उन्हें उचित तरीके से सुखाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में समय और श्रम दोनों अधिक लगते हैं। मौसम में अचानक बदलाव भी फूलों और उत्पादन को प्रभावित कर सकता है।
मेहनत ज्यादा, लेकिन कीमत भी आकर्षक
केसर की खेती किसानों के लिए संभावनाओं वाला क्षेत्र हो सकती है, लेकिन इसमें उतरने से पहले जलवायु, मिट्टी, सिंचाई और बाजार की जानकारी हासिल करना जरूरी है। सीमित उत्पादन, अधिक श्रम और विशेष परिस्थितियों के कारण केसर महंगा मसाला है। सही तकनीक और अनुकूल वातावरण मिलने पर पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी खेती किसानों के लिए बेहतर आय का विकल्प बन सकती है।
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