Rare Diseases in India: भारत में डेंगू, मलेरिया, टीबी, मधुमेह और वायरल फीवर जैसी बीमारियों के बारे में लगभग हर कोई जानता है। लेकिन देश में कुछ ऐसे दुर्लभ संक्रमण भी हैं, जिनकी जानकारी आम लोगों को कम है। इनमें कई बीमारियां मच्छर, संक्रमित कीड़े, टिक, जानवर, दूषित पानी या मिट्टी के संपर्क से फैल सकती हैं। समस्या यह है कि शुरुआती लक्षण सामान्य बुखार या संक्रमण जैसे दिखाई देते हैं, जिससे पहचान में देरी हो सकती है।
1. मेलिओडोसिस: मिट्टी और पानी से फैलने वाला संक्रमण
मेलिओडोसिस एक बैक्टीरियल संक्रमण है, जो Burkholderia pseudomallei नामक बैक्टीरिया के कारण होता है। यह दूषित मिट्टी और पानी में पाया जा सकता है। कटे-फटे घाव, दूषित पानी या मिट्टी के संपर्क और कभी-कभी सांस के जरिए संक्रमण शरीर में पहुंच सकता है। तेज बुखार, खांसी, सांस लेने में परेशानी तथा सीने या जोड़ों में दर्द इसके प्रमुख लक्षण हैं।
2. स्क्रब टाइफस: संक्रमित माइट्स से खतरा
स्क्रब टाइफस Orientia tsutsugamushi बैक्टीरिया से होने वाली बीमारी है, जो संक्रमित माइट्स के काटने से फैलती है। बारिश के मौसम में इसका जोखिम बढ़ सकता है। तेज बुखार, सिरदर्द और शरीर में दर्द इसके सामान्य लक्षण हैं। कुछ मरीजों में काटने वाली जगह पर काला निशान यानी एस्चर भी दिखाई देता है। गंभीर स्थिति में फेफड़े, दिमाग और किडनी प्रभावित हो सकते हैं।
3. निपाह वायरस: जानवरों से इंसानों तक संक्रमण
निपाह एक गंभीर जूनोटिक वायरस संक्रमण है। चमगादड़ इसके प्राकृतिक होस्ट माने जाते हैं और संक्रमित जानवरों या दूषित भोजन के जरिए इंसानों तक वायरस पहुंच सकता है। संक्रमित व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में भी संक्रमण फैलने की संभावना रहती है। बुखार, सिरदर्द, उल्टी और सांस लेने में परेशानी शुरुआती लक्षण हो सकते हैं। गंभीर मामलों में दिमाग में सूजन और कोमा जैसी स्थिति बन सकती है।
4. लेप्टोस्पायरोसिस: बाढ़ के बाद बढ़ता खतरा
लेप्टोस्पायरोसिस जानवरों, विशेषकर चूहों से जुड़े बैक्टीरिया के कारण होता है। दूषित पानी या मिट्टी के संपर्क में आने पर बैक्टीरिया कटे घाव, आंख, नाक या मुंह के रास्ते शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। भारी बारिश और बाढ़ के बाद इसका खतरा बढ़ जाता है। तेज बुखार, कंपकंपी, सिरदर्द, मांसपेशियों में दर्द और लाल आंखें इसके लक्षण हैं। गंभीर मामलों में पीलिया और किडनी की समस्या हो सकती है।
5. क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज: जंगलों में सावधानी जरूरी
क्यासानूर फॉरेस्ट डिजीज यानी KFD को मंकी फीवर भी कहा जाता है। इसकी पहचान पहली बार 1957 में कर्नाटक में हुई थी। यह मुख्य रूप से संक्रमित टिक के काटने से फैलती है और जंगलों में रहने या काम करने वाले लोगों में जोखिम अधिक हो सकता है। तेज बुखार, सिरदर्द, कमजोरी और कुछ मामलों में ब्लीडिंग इसके लक्षण हैं।
6. काला-अजार: लंबे बुखार को नजरअंदाज न करें
काला-अजार या विसरल लीशमनियासिस एक परजीवी संक्रमण है, जो संक्रमित मादा सैंडफ्लाई के काटने से फैलता है। इसमें लंबे समय तक बुखार बना रह सकता है। वजन कम होना और तिल्ली तथा लिवर का बढ़ना भी इसके महत्वपूर्ण संकेत हैं। इलाज में देरी होने पर यह गंभीर और जानलेवा हो सकता है।
7. रेबीज: लक्षण दिखने से पहले इलाज जरूरी
रेबीज संक्रमित कुत्ते, बिल्ली, बंदर या अन्य जानवर के काटने अथवा लार के संपर्क से फैल सकता है। लक्षण शुरू होने के बाद यह बेहद घातक बीमारी है। हालांकि, जानवर के काटने के तुरंत बाद घाव को अच्छी तरह धोकर चिकित्सकीय सलाह और निर्धारित एंटी-रेबीज वैक्सीन लेने से बीमारी को रोका जा सकता है।
8. नेग्लैरिया फाउलेरी: गर्म पानी से सावधान
नेग्लैरिया फाउलेरी को आमतौर पर ब्रेन-ईटिंग अमीबा कहा जाता है। यह गर्म मीठे पानी में पाया जाने वाला सूक्ष्म जीव है। दूषित पानी नाक के रास्ते शरीर में जाने पर यह गंभीर संक्रमण पैदा कर सकता है। शुरुआती लक्षण मेनिन्जाइटिस जैसे हो सकते हैं, इसलिए इसकी पहचान चुनौतीपूर्ण होती है। यह इंसान से इंसान में सामान्यतः नहीं फैलता।
9. सांप का काटना: तुरंत चिकित्सा जरूरी
भारत में कोबरा, क्रेट, रसेल वाइपर और सॉ-स्केल्ड वाइपर जैसे जहरीले सांप गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं। इनके जहर से लकवा, रक्तस्राव और किडनी को नुकसान हो सकता है। सांप के काटने पर घरेलू उपचार में समय गंवाने के बजाय तुरंत अस्पताल पहुंचना और जरूरत पड़ने पर एंटीवेनम उपचार लेना बेहद जरूरी है।
मौसम और इलाके के अनुसार बढ़ता है जोखिम
इन दुर्लभ बीमारियों से बचाव के लिए जागरूकता बेहद जरूरी है। बाढ़ के दौरान दूषित पानी से दूरी, जंगलों में टिक और कीड़ों से बचाव, सुरक्षित पेयजल और जानवरों से सावधानी जोखिम कम कर सकती है। किसी संदिग्ध संक्रमण, जानवर के काटने या गंभीर लक्षण की स्थिति में तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
Read More : Surguja News: स्वतंत्रता दिवस पर सरगुजा को बड़ी सौगात, महिला प्रशिक्षण संस्थान को मिली मंजूरी