UP Congress: उत्तर प्रदेश के सीतापुर में कांग्रेस के पुराने कार्यालय को लेकर कानूनी विवाद गहरा गया है। नगर पालिका परिषद ने कांग्रेस को कार्यालय खाली करने के लिए 15 दिन का समय दिया था। इस आदेश के खिलाफ कांग्रेस ने इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच का दरवाजा खटखटाया और बेदखली की कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की। हालांकि, अदालत ने कांग्रेस नगर अध्यक्ष की ओर से दायर याचिका में तत्काल राहत देने से इनकार कर दिया।
हाई कोर्ट ने बेदखली आदेश पर रोक नहीं लगाई
जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की पीठ ने कांग्रेस कमेटी, सीतापुर की रिट याचिका पर सुनवाई की। याचिका में नगर पालिका परिषद के कार्यकारी अधिकारी (प्रभारी) द्वारा जारी उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें टैमसेन गंज इलाके में स्थित प्लॉट नंबर 244/1 से संबंधित रिकॉर्ड से कांग्रेस के नाम हटाने और परिसर खाली कराने का निर्देश दिया गया था।
कांग्रेस ने 1971 से कब्जे का दावा किया
सुनवाई के दौरान कांग्रेस की ओर से दावा किया गया कि पार्टी का सीतापुर स्थित कार्यालय वर्ष 1971 से संबंधित परिसर में है। याचिकाकर्ताओं ने अपने कब्जे के समर्थन में 1971 में 320 रुपये किराया जमा किए जाने की एक रसीद भी अदालत के सामने रखी। कांग्रेस का तर्क था कि इतने लंबे समय से परिसर का इस्तेमाल किया जा रहा है, इसलिए अचानक बेदखली की कार्रवाई उचित नहीं है।
55 साल से किराया नहीं देने का आरोप
मामले में राज्य सरकार की ओर से कांग्रेस के दावे का विरोध किया गया। सरकार ने अदालत को बताया कि संबंधित संपत्ति नजूल भूमि है और उस पर कांग्रेस का कब्जा कानूनी आवंटन के आधार पर नहीं है। सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि 1971 में किराए की रसीद के बाद पिछले करीब 55 वर्षों से कोई किराया जमा नहीं किया गया। कांग्रेस की ओर से ऐसा कोई वैध दस्तावेज पेश नहीं किया जा सका, जिससे वर्तमान कब्जे की कानूनी स्थिति स्पष्ट हो सके।
अलॉटमेंट दस्तावेज नहीं दिखा सकी कांग्रेस
अदालत ने सुनवाई के दौरान खास तौर पर इस बात पर ध्यान दिया कि याचिकाकर्ता संबंधित संपत्ति के वैध आवंटन को साबित करने वाला कोई अलॉटमेंट ऑर्डर, समझौता पत्र या अन्य कानूनी दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर पाए। केवल लंबे समय से किसी सरकारी संपत्ति पर कब्जा होना अपने आप में उस कब्जे को कानूनी अधिकार नहीं देता।
सरकारी जमीन पर लंबे कब्जे से अधिकार नहीं मिलता
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकारी जमीन पर दशकों तक कब्जा रहने से वह अपने आप वैध नहीं हो जाता। यदि कोई व्यक्ति या संस्था सरकारी संपत्ति पर अपने कानूनी अधिकार का दावा करती है, तो उसे उस दावे के समर्थन में वैध दस्तावेज पेश करने होंगे। अदालत ने माना कि केवल पुराने कब्जे या सीमित पुराने रिकॉर्ड के आधार पर बेदखली की कार्रवाई को रोकने का आधार नहीं बनता।
अंतरिम राहत की कांग्रेस की मांग खारिज
इन परिस्थितियों को देखते हुए हाई कोर्ट की पीठ ने बेदखली आदेश पर अंतरिम रोक लगाने की कांग्रेस की मांग स्वीकार नहीं की। अदालत ने फिलहाल याचिकाकर्ता को वह राहत नहीं दी, जिसकी मांग नगर पालिका के आदेश के खिलाफ की गई थी। इससे सीतापुर स्थित कांग्रेस कार्यालय को खाली कराने की कार्रवाई पर तत्काल न्यायिक रोक नहीं लगी है।
दोनों पक्षों को जवाब दाखिल करने का समय
अदालत ने मामले की आगे की सुनवाई के लिए प्रक्रिया भी निर्धारित की है। प्रतिवादियों को तीन सप्ताह के भीतर अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। इसके बाद याचिकाकर्ता यानी कांग्रेस को जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय मिलेगा। अब मामले की अगली कार्यवाही में दोनों पक्षों के दस्तावेज और दावे महत्वपूर्ण होंगे।
कार्यालय के भविष्य पर टिकी नजरें
सीतापुर में दशकों पुराने कांग्रेस कार्यालय को लेकर हाई कोर्ट के इस आदेश के बाद अब आगे की कानूनी प्रक्रिया पर नजर रहेगी। फिलहाल अदालत ने बेदखली आदेश पर रोक लगाने से इनकार किया है। साथ ही, कांग्रेस के लिए संपत्ति पर अपने कानूनी अधिकार को साबित करने के लिए वैध दस्तावेज पेश करना महत्वपूर्ण होगा। मामले में अंतिम निर्णय आगे की सुनवाई और दोनों पक्षों के जवाब के बाद सामने आएगा।
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