Chhattisgarh News : छत्तीसगढ़ के NH-43 को अंबिकापुर में देखने के बाद लगता है कि सड़क निर्माण विभाग ने ‘हाईवे’ शब्द का नया अर्थ गढ़ लिया है। यहाँ सड़क सिर्फ नाम की है, बाकी सब गड्ढों का साम्राज्य है। कहीं गड्ढे सड़क को निगल रहे हैं, कहीं सड़क गड्ढों के बीच अपनी उपस्थिति साबित करने के लिए संघर्ष कर रही है। आम आदमी के लिए यह रास्ता अब यात्रा नहीं, बल्कि मुफ्त में मिलने वाला ‘एडवेंचर स्पोर्ट्स पैकेज’ बन चुका है—बिना हेलमेट, बिना इंश्योरेंस, बिना वापसी की गारंटी।
जनता सालों से इन गड्ढों में अपनी गाड़ियाँ, कमर और धैर्य तीनों की परीक्षा देती आ रही है। शिकायतें हुईं, आवेदन दिए गए, सोशल मीडिया पर समस्या खूब प्रचारित हुआ, युवाओं ने गड्ढों के गंदे पानी में नहाकर विरोध जताया, मीडिया ने खबरें दिखाईं… लेकिन जनप्रतिनिधियों को लगता रहा कि यह सब ‘लोकतंत्र का सामान्य शोर’ है। शायद वे किसी शुभ मुहूर्त का इंतजार कर रहे थे—जब तक किसी बड़े आदमी की गाड़ी इन गड्ढों की मेहमाननवाजी का शिकार नहीं होती, तब तक सड़क सुधारने का ‘आवश्यकता’ का बोध नहीं जागता।
आखिर वह शुभ घड़ी आ ही गई। संगठन महामंत्री पवन साय का काफिला NH-43 पर पहुँचा और सीतापुर के गड्ढों ने उन्हें बिना टिकट ‘लाइव ऑफ-रोडिंग’ का अनुभव करा दिया। पर्यटन मंत्री अपने जिले में पर्यटन को बढ़ावा देने के सपने देख रहे होंगे, लेकिन NH-43 ने खुद ही ‘एडवेंचर टूरिज्म’ का प्रैक्टिकल क्लास ले लिया। वीआईपी गाड़ी के पहिए गड्ढे में उतरे, सस्पेंशन ने कराह उठाई, और संगठन शिल्पी का पारा सातवें आसमान से भी ऊपर चला गया। फिर क्या प्रभारी मंत्री, क्या विधायक और क्या NH के ईई?
फिर जो हुआ, वह कमाल था। असंख्य शिकायतों, मांगों, मीडिया की रिपोर्टिंग और युवाओं के विरोध से जो काम नहीं हुआ, वह वीआईपी गाड़ी के एक तगड़े झटके ने कुछ ही मिनटों में कर दिखाया। अचानक गड्ढे ‘गंभीर प्रशासनिक समस्या’ बन गए। जिम्मेदार अधिकारियों की क्लास लगी, खरी-खोटी सुनाई गई, और मुरम गिट्टी- पत्थर लेकर मशीनरी सड़क पर दौड़ पड़ी—मानो किसी युद्धकालीन आपात स्थिति में।
विडंबना देखिए—कुछ दिन पहले स्थानीय युवाओं ने इन्हीं गड्ढों के कीचड़ भरे पानी में नहाकर अपना दर्द जताया था। तब वह सिर्फ ‘तमाशा’ था, ‘युवाओं की शरारत’ थी। लोग जिले के जनप्रतिनिधियों से क्यों उम्मीद रखते हैं कि वे मजदूर झोपड़ी वाले गरीबों और आम लोगों के बारे में भी थोड़ा सोचें । ऐसे लोग सत्ता की बैसाखी बनने के लिए हैं। जिले के नेताजी लोगों के सत्ता सुख में हिस्सेदारी के लिए नहीं। नेताजी कतई बर्दाश्त नहीं कर सकते कि कोई उनकी स्वच्छंदता को चुनौती दे। लेकिन जैसे ही वीआईपी के जूतों पर मिट्टी लगी और गाड़ी का सस्पेंशन कराह उठा, वही गड्ढे अचानक ‘राज्य आपदा’ की श्रेणी में पहुँच गए।
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सवाल सीधा और कड़वा है
क्या लोकतंत्र में सड़क, बिजली, पानी जैसी बुनियादी सुविधाएँ पाने के लिए हर बार किसी वीआईपी की गाड़ी का फँसना जरूरी है? जनता गड्ढे में गिरे तो ‘किस्मत खराब’, वीआईपी गाड़ी फँसे तो ‘प्रशासन दोषी’! जनता की बाइक टूटे तो ‘निजी समस्या’, वीआईपी वाहन का सस्पेंशन झटके तो ‘सरकारी संकट’! अगर यही व्यवस्था का नया मॉडल है, तो जनता को अगली बार शिकायत करने के बजाय सीधे किसी वीआईपी काफिले को अपने इलाके के गड्ढों तक लाने का इंतजाम करना चाहिए। क्योंकि जनता के धरने से सड़क नहीं सुधरी, युवाओं के विरोध से नहीं सुधरी, मीडिया की खबरों से नहीं सुधरी—लेकिन वीआईपी गाड़ी के एक झटके ने पूरी व्यवस्था को हिला दिया। सचमुच, लोकतंत्र में सब बराबर हैं… बस कुछ लोगों के गड्ढे ज्यादा ‘प्रभावी’ होते हैं।और कुछ लोगों के जूतों पर गिरी मिट्टी, बाकी सबकी गाड़ियों से ज्यादा कीमती साबित होती है।
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