Iran News: अमेरिका ने ईरान को वैश्विक आर्थिक और वित्तीय नेटवर्क से अलग-थलग करने के लिए अपना दबाव अभियान तेज कर दिया है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने ईरान के अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संपर्कों और आय के स्रोतों पर कार्रवाई के लिए ‘ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट’ की घोषणा की है। हालांकि, इस रणनीति के सामने चीन एक बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है। चीन न केवल ईरान का प्रमुख व्यापारिक साझेदार है, बल्कि उसके कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार भी है।
चीन पर टिकी ईरान की आर्थिक उम्मीदें
बीजिंग और तेहरान के बीच लंबे समय से व्यापारिक और ऊर्जा संबंध मजबूत रहे हैं। चीन ईरान से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल खरीदता है और दोनों देशों के बीच विभिन्न क्षेत्रों में आर्थिक सहयोग जारी है। ऐसे में अमेरिका के लिए ईरान को पूरी तरह वैश्विक आर्थिक व्यवस्था से काटना आसान नहीं होगा। यदि चीन ईरान के साथ अपने मौजूदा व्यापारिक रिश्ते जारी रखता है, तो अमेरिकी प्रतिबंधों का प्रभाव सीमित हो सकता है।
अमेरिका का आर्थिक दबाव अभियान
डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाने के लिए व्यापक रणनीति तैयार की है। इसका उद्देश्य ईरानी सरकार की आय के प्रमुख स्रोतों और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संपर्कों को कमजोर करना है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि ईरान से जुड़े तेल, शिपिंग, तकनीक और वित्तीय नेटवर्क को निशाना बनाया जाएगा। वाशिंगटन चाहता है कि तेहरान को आर्थिक रूप से इतना दबाव महसूस हो कि वह अपनी नीतियों में बदलाव के लिए मजबूर हो।
ट्रंप-शी मुलाकात के बीच बढ़ी जटिलता
अमेरिका के सामने सबसे बड़ी परेशानी यह है कि ईरान पर दबाव डालने के साथ उसे चीन के साथ अपने व्यापारिक रिश्तों को भी संभालना है। अगले महीने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच अहम बैठक प्रस्तावित है। दोनों देश पहले से ही व्यापार और टैरिफ जैसे मुद्दों पर तनाव के बावजूद एक नाजुक समझौते को बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।
चीन को सीधे निशाना बनाने से बच रहा अमेरिका
विदेश नीति विशेषज्ञों के मुताबिक, वाशिंगटन इस समय चीन के साथ एक और बड़ा विवाद खड़ा करने से बचना चाहता है। सीएसआईएस के वरिष्ठ सलाहकार एडगार्ड कागन का मानना है कि अमेरिकी वित्त मंत्री ने ईरान पर कार्रवाई की घोषणा करते समय चीन को सीधे तौर पर निशाना बनाने से परहेज किया है। इसकी एक वजह आगामी ट्रंप-शी बैठक को माना जा रहा है, क्योंकि अमेरिका इस महत्वपूर्ण कूटनीतिक मुलाकात को किसी नए विवाद से प्रभावित नहीं करना चाहता।
बीजिंग ने अमेरिकी प्रतिबंधों पर जताई आपत्ति
चीन ने अमेरिका की रणनीति पर अपनी स्थिति भी स्पष्ट कर दी है। बीजिंग का कहना है कि ईरान के साथ उसका व्यापारिक और ऊर्जा सहयोग अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप है। चीनी विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी एकतरफा प्रतिबंधों का विरोध करते हुए संकेत दिया है कि वह अपने वैध आर्थिक हितों की रक्षा करेगा। चीन का यह रुख अमेरिकी अभियान के लिए बड़ी चुनौती पैदा कर सकता है।
ईरान के तेल कारोबार में चीन की अहम भूमिका
चीन ईरान के तेल निर्यात का सबसे बड़ा खरीदार है और रिपोर्टों के अनुसार ईरान के कुल तेल निर्यात का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा चीन को जाता है। यही वजह है कि ईरान की अर्थव्यवस्था पर अमेरिकी दबाव की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर कर सकती है कि बीजिंग तेहरान के साथ अपने ऊर्जा कारोबार को किस स्तर तक जारी रखता है। चीन अगर तेल खरीदता रहता है तो ईरान को महत्वपूर्ण आर्थिक सहारा मिलता रहेगा।
चीन सीधे टकराव से बच सकता है
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन अमेरिका के साथ खुला टकराव नहीं चाहता, लेकिन वह वाशिंगटन की सभी मांगों को स्वीकार भी नहीं करेगा। स्टिमसन सेंटर की विशेषज्ञ सन यून के अनुसार, चीन ईरान के खिलाफ ऐसे किसी अभियान का समर्थन नहीं करेगा जिसका उद्देश्य वहां की सरकार को गिराना हो। हालांकि, यदि अमेरिकी दबाव का मकसद क्षेत्रीय तनाव कम करना है, तो चीन सीमित स्तर पर सहयोग करने पर विचार कर सकता है।
तेल खरीद में कटौती का विकल्प
विशेषज्ञों के मुताबिक, चीन अमेरिका के साथ तनाव कम करने के लिए ईरान से होने वाले तेल आयात में कुछ कमी कर सकता है। ऐसा कदम बीजिंग की ओर से वाशिंगटन को सहयोग का संकेत हो सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होगा कि चीन ईरान के साथ अपने आर्थिक संबंध पूरी तरह खत्म कर देगा। चीन के लिए ऊर्जा सुरक्षा और अपने आर्थिक हित प्राथमिक बने रहेंगे।
ट्रंप-शी बैठक पर सबकी नजर
आगामी ट्रंप-शी जिनपिंग बैठक के कारण दोनों देशों के लिए संतुलन बनाना बेहद महत्वपूर्ण हो गया है। अमेरिका ईरान पर अपना दबाव बनाए रखना चाहता है, लेकिन चीन के साथ व्यापारिक रिश्तों को नुकसान पहुंचाने का जोखिम नहीं लेना चाहता। दूसरी ओर, बीजिंग भी वाशिंगटन के साथ बड़े टकराव से बचना चाहेगा, लेकिन ईरान के साथ अपने महत्वपूर्ण आर्थिक संबंधों को पूरी तरह खत्म करने के लिए तैयार नहीं दिख रहा है।
ईरान पर अमेरिकी रणनीति की असली परीक्षा
कुल मिलाकर, ईरान के खिलाफ अमेरिका का ‘ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट’ अब केवल वाशिंगटन और तेहरान के बीच का मामला नहीं रह गया है। चीन की भूमिका इस अभियान की सफलता या विफलता में निर्णायक साबित हो सकती है। अमेरिका को जहां चीन से सीमित सहयोग की उम्मीद करनी होगी, वहीं बीजिंग अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों को प्राथमिकता देगा। ऐसे में आने वाले दिनों में ईरान, चीन और अमेरिका के बीच आर्थिक तथा कूटनीतिक समीकरण पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी।
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