J&K Politics: श्रीनगर में जम्मू-कश्मीर की राजनीति उस समय गरमा गई है, जब प्रस्तावित कैबिनेट विस्तार से पहले कांग्रेस ने नेशनल कॉन्फ्रेंस की सरकार में शामिल होने की पेशकश को ठुकरा दिया। जम्मू-कश्मीर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष तारिक हमीद कर्रा ने स्पष्ट किया कि पार्टी का रुख पिछले दो वर्षों से पूरी तरह स्पष्ट है। कांग्रेस ने नेशनल कॉन्फ्रेंस सरकार को समर्थन जम्मू-कश्मीर के सांप्रदायिक सौहार्द और एकता की रक्षा के उद्देश्य से दिया है, लेकिन जब तक राज्य का दर्जा बहाल नहीं होता, तब तक वह सरकार में मंत्री पद स्वीकार नहीं करेगी।
राज्य का दर्जा बहाल होने तक जारी रहेगा कांग्रेस का अलग रुख
तारिक हमीद कर्रा ने कहा कि सरकार को समर्थन देना और कैबिनेट का हिस्सा बनना दो अलग-अलग बातें हैं। कांग्रेस ने केंद्र के उस फैसले का लगातार विरोध किया है, जिसके तहत जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म कर इसे केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया। पार्टी का कहना है कि जब तक जम्मू-कश्मीर को दोबारा राज्य का दर्जा नहीं मिलता, तब तक कांग्रेस सरकार में शामिल होने के अपने फैसले को नहीं बदलेगी। हालांकि, पार्टी ने उमर अब्दुल्ला सरकार को बाहर से अपना समर्थन जारी रखने की बात कही है।
नेशनल कॉन्फ्रेंस ने पिछले सप्ताह दिया था नया प्रस्ताव
नेशनल कॉन्फ्रेंस की ओर से पिछले सप्ताह कांग्रेस को कैबिनेट में शामिल होने का प्रस्ताव दिया गया था। इसके बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई थी कि कांग्रेस सरकार में शामिल होगी या नहीं। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने इन अटकलों पर स्थिति साफ करते हुए कहा कि पार्टी ने अपने सिद्धांतों और राजनीतिक प्रतिबद्धताओं के आधार पर फैसला लिया है। उनके मुताबिक, मौजूदा परिस्थितियों में कांग्रेस अपने पुराने रुख से पीछे हटने वाली नहीं है।
जमीन और नौकरियों के अधिकार भी कांग्रेस की प्राथमिकता
कांग्रेस का कहना है कि जम्मू-कश्मीर के लोगों के संवैधानिक अधिकारों की बहाली उसकी प्रमुख मांगों में शामिल है। पार्टी विशेष रूप से राज्य का दर्जा वापस देने के साथ जमीन, नौकरियों और प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय लोगों के अधिकारों की सुरक्षा चाहती है। कांग्रेस का आरोप है कि केंद्र ने जम्मू-कश्मीर के लोगों के संवैधानिक अधिकारों को एकतरफा तरीके से प्रभावित किया है। ऐसे में इन अधिकारों की बहाली तक कैबिनेट में शामिल होना पार्टी के लिए स्वीकार्य नहीं है।
जम्मू-कश्मीर कैबिनेट में फिलहाल छह मंत्री
जम्मू-कश्मीर फिलहाल केंद्र शासित प्रदेश है और यहां मंत्रिपरिषद के आकार को लेकर कानूनी सीमा निर्धारित है। मौजूदा व्यवस्था के मुताबिक मुख्यमंत्री समेत मंत्रिपरिषद में नौ सदस्यों की स्वीकृत संख्या है। हालांकि, इस समय उमर अब्दुल्ला सरकार में मुख्यमंत्री के अलावा छह मंत्री ही हैं। ऐसे में संभावित कैबिनेट विस्तार को लेकर राजनीतिक गतिविधियां बढ़ गई हैं और कांग्रेस के फैसले ने समीकरणों को और दिलचस्प बना दिया है।
कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच पहले भी दिखे मतभेद
उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में सरकार बनने के समय भी कांग्रेस ने कैबिनेट में शामिल नहीं होने का फैसला किया था। उस समय कथित तौर पर सीमित मंत्री पद मिलने को लेकर पार्टी के भीतर नाराजगी की चर्चा थी। इसके बाद दोनों सहयोगी दलों के बीच मतभेदों की खबरें और तेज हुईं। पिछले वर्ष राज्यसभा सीटों के बंटवारे को लेकर भी कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच खींचतान सामने आई थी।
राज्यसभा सीटों को लेकर गठबंधन में बढ़ी थी दूरी
राज्यसभा चुनाव से पहले नेशनल कॉन्फ्रेंस ने चार में से तीन सीटों के लिए अपने उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए थे। कांग्रेस को चौथी सीट की पेशकश की गई, लेकिन पार्टी ने इसे सुरक्षित सीट नहीं माना। कांग्रेस का दावा था कि उसे जीतने योग्य सीट देने का भरोसा दिया गया था। इसी वजह से उसने चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया। बाद में नेशनल कॉन्फ्रेंस ने तीन सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि चौथी सीट बीजेपी के सत शर्मा के खाते में गई। इस घटनाक्रम ने दोनों सहयोगी दलों के बीच भरोसे को लेकर सवाल खड़े किए थे।
90 सदस्यीय विधानसभा में आंकड़े क्या कहते हैं
जम्मू-कश्मीर विधानसभा में कुल 90 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए 46 विधायकों का समर्थन जरूरी है। मौजूदा राजनीतिक आंकड़ों के अनुसार नेशनल कॉन्फ्रेंस के पास 41 विधायक हैं, जबकि कांग्रेस के छह विधायक हैं। दोनों दलों को जोड़ने पर संख्या 47 तक पहुंचती है, जो बहुमत के आंकड़े से एक अधिक है। बीजेपी के पास 29 और पीडीपी के पास चार विधायक हैं। इसके अलावा नेशनल कॉन्फ्रेंस को कुछ छोटी पार्टियों और निर्दलीय विधायकों का समर्थन भी प्राप्त है।
सरकार को समर्थन रहेगा, लेकिन मंत्री पद नहीं लेगी कांग्रेस
कांग्रेस के ताजा फैसले से साफ है कि पार्टी उमर अब्दुल्ला सरकार की स्थिरता के लिए समर्थन जारी रखेगी, लेकिन कैबिनेट में शामिल होने के मुद्दे पर अपने पुराने रुख पर कायम रहेगी। अब निगाहें प्रस्तावित कैबिनेट विस्तार पर टिकी हैं। कांग्रेस के इनकार के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस को मंत्रिपरिषद के विस्तार और राजनीतिक संतुलन को लेकर नए सिरे से रणनीति बनानी पड़ सकती है। राज्य का दर्जा बहाल करने का मुद्दा फिलहाल दोनों दलों के रिश्तों में सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक बिंदु बना हुआ है।
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