Jharkhand Raksha Bandhan 2026: रक्षाबंधन के अवसर पर झारखंड में भाई-बहन के रिश्ते से आगे बढ़कर प्रकृति के साथ भावनात्मक जुड़ाव की अनोखी मिसाल देखने को मिली। राज्य के अलग-अलग इलाकों में आदिवासी महिलाओं ने पेड़ों को राखी बांधकर उनके संरक्षण का संकल्प लिया। इस पहल का उद्देश्य लोगों को जंगल और पेड़ों के महत्व से जोड़ना तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखना है।
700 गांवों में एक लाख पेड़ों को राखी बांधने का लक्ष्य
‘पेड़ बचाओ’ अभियान के तहत शुक्रवार को झारखंड के करीब 700 गांवों में हजारों ग्रामीण लगभग एक लाख पेड़ों को राखी बांधेंगे। इस अभियान को सिर्फ एक दिन तक सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि इसे पूरे एक महीने तक चलाने की योजना है। राज्य के 24 जिलों के चिन्हित गांवों में करीब तीन लाख पेड़ों को राखी बांधने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
गुमला से अभियान को मिलेगी औपचारिक शुरुआत
अभियान की शुरुआत गुमला जिले के जोराड़ गांव से की जाएगी। यहां अभियान से जुड़े लोग पेड़ को राखी बांधकर लोगों को पर्यावरण संरक्षण का संदेश देंगे। आयोजकों का मानना है कि रक्षाबंधन जैसे भावनात्मक पर्व के माध्यम से लोगों में पेड़ों और जंगलों के प्रति जिम्मेदारी की भावना को और मजबूत किया जा सकता है।
आदिवासी महिलाओं ने जंगल को बताया माता-पिता जैसा
स्थानीय आदिवासी महिला रेशमा मर्डी ने कहा कि जंगलों की रक्षा करने की परंपरा उन्हें अपने पूर्वजों से मिली है। उनके मुताबिक, आदिवासी समाज के लिए जंगल केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि परिवार के सदस्य और माता-पिता के समान हैं। पेड़ों को राखी बांधने के पीछे यही भावना है कि लोग प्रकृति की रक्षा को अपनी जिम्मेदारी समझें और बच्चों को भी पर्यावरण संरक्षण की सीख दें।
जमुना टुडू ने पेड़ों की रक्षा का लिया संकल्प
पद्म श्री सम्मान से सम्मानित जमुना टुडू ने भी रक्षाबंधन पर पेड़ों को राखी बांधी। उन्होंने कहा कि यह प्रतीकात्मक कार्यक्रम जंगल और पेड़ों की लंबी उम्र तथा संरक्षण के संकल्प से जुड़ा है। उन्होंने जंगल को बचाने और पेड़ों की कटाई रोकने की प्रतिबद्धता जताई। उनके अनुसार, पेड़ों को भाई मानकर राखी बांधना प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी और सुरक्षा की भावना को दर्शाता है।
पेड़ों के साथ वन्यजीवों की सुरक्षा पर भी जोर
जमुना टुडू ने जंगलों में रहने वाले वन्यजीवों की सुरक्षा को भी जरूरी बताया। उन्होंने कहा कि पेड़ों और जंगलों के नष्ट होने का असर वन्यजीवों पर भी पड़ता है। हाथियों के आबादी वाले इलाकों की ओर आने की घटनाओं को जंगलों की कटाई से जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि जंगल सुरक्षित रहेंगे तो वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास भी सुरक्षित रहेगा। महिलाओं ने जंगलों की रक्षा के लिए लगातार काम करने का संकल्प लिया।
24 जिलों में तीन लाख पेड़ों तक पहुंचेगा अभियान
प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) ने बताया कि रक्षाबंधन के दिन करीब 700 गांवों में एक लाख पेड़ों को राखी बांधने का लक्ष्य रखा गया है। इसके बाद भी अभियान जारी रहेगा और एक महीने के दौरान राज्य के 24 जिलों में लगभग तीन लाख पेड़ों को राखी बांधी जाएगी। इसका मकसद ग्रामीण समुदायों को पर्यावरण संरक्षण की मुहिम से जोड़ना है।
2004 में शुरू हुई थी पेड़ बचाने की पहल
इस अभियान की शुरुआत वर्ष 2004 में धनबाद जिले के टुंडी प्रखंड के लुकैया गांव से हुई थी। यह क्षेत्र कभी माओवादी गतिविधियों से प्रभावित माना जाता था। समय के साथ यह पहल राज्य के कई हिस्सों तक पहुंच गई। अब तक झारखंड के 12 हजार से अधिक गांवों को इस कार्यक्रम से जोड़े जाने का दावा किया गया है।
महुआ के पेड़ों से ग्रामीणों को मिला आर्थिक सहारा
अभियान से जुड़े लोगों के अनुसार, लुकैया गांव में 20 हजार से अधिक महुआ के पेड़ों को संरक्षण मिला। इन पेड़ों ने समय के साथ ग्रामीणों की आजीविका में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इससे यह संदेश सामने आया कि जंगलों का संरक्षण केवल पर्यावरण के लिए जरूरी नहीं है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोजगार से भी सीधे जुड़ा हुआ है।
रक्षाबंधन बना पर्यावरण संरक्षण का माध्यम
झारखंड में पेड़ों को राखी बांधने की यह पहल पारंपरिक पर्व को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने का प्रभावी प्रयास है। आदिवासी समुदायों की भागीदारी से अभियान को सामाजिक और भावनात्मक आधार मिल रहा है। पेड़ को भाई मानकर उसकी रक्षा का संकल्प लेने से लोगों को जंगलों की कटाई रोकने, वन्यजीवों की सुरक्षा करने और प्राकृतिक संसाधनों को आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाने का संदेश दिया जा रहा है।
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