El Nino 2026: समुद्र की गहराइयों में नजर आने वाली रंग-बिरंगी चट्टानें और पत्थरों जैसी संरचनाएं वास्तव में कोरल रीफ यानी प्रवाल भित्तियां होती हैं। ये समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और हजारों समुद्री जीवों को भोजन, आश्रय तथा प्रजनन का स्थान उपलब्ध कराती हैं। लेकिन अब इन पर जलवायु परिवर्तन का बड़ा खतरा मंडरा रहा है। वैज्ञानिकों की चिंता संभावित बेहद शक्तिशाली अल नीनो को लेकर बढ़ गई है, क्योंकि समुद्र के तापमान में होने वाली असामान्य वृद्धि पहले से कमजोर कोरल रीफ के लिए गंभीर संकट पैदा कर सकती है।
शक्तिशाली अल नीनो से बढ़ सकती है समुद्र की गर्मी
अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जिसमें मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इसका प्रभाव केवल प्रशांत क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दुनिया के कई हिस्सों के तापमान और मौसम के पैटर्न को प्रभावित करता है। अगर आने वाले समय में अल नीनो बेहद मजबूत रूप लेता है, तो समुद्र की गर्मी बढ़ सकती है। इससे कोरल रीफ पर लंबे समय तक हीट स्ट्रेस पड़ने की आशंका है।
गर्म पानी में कोरल क्यों पड़ने लगते हैं सफेद
कोरल और उनके भीतर रहने वाले सूक्ष्म शैवाल के बीच बेहद महत्वपूर्ण संबंध होता है। ये शैवाल कोरल को ऊर्जा उपलब्ध कराते हैं और उनके रंग के लिए भी जिम्मेदार होते हैं। जब समुद्र का पानी लंबे समय तक असामान्य रूप से गर्म रहता है, तो कोरल इन शैवालों को बाहर निकालने लगते हैं। इसके परिणामस्वरूप कोरल सफेद दिखाई देने लगते हैं। इसी प्रक्रिया को कोरल ब्लीचिंग कहा जाता है। ब्लीचिंग के बाद कोरल तुरंत नहीं मरते, लेकिन लंबे समय तक गर्मी का दबाव उनकी मौत का कारण बन सकता है।
2023-24 की रिकॉर्ड ब्लीचिंग ने बढ़ाई वैज्ञानिकों की चिंता
वैज्ञानिकों की चिंता इसलिए भी गंभीर है क्योंकि दुनिया हाल के वर्षों में बड़े पैमाने पर कोरल ब्लीचिंग की अभूतपूर्व घटना देख चुकी है। 2023 में शुरू हुई वैश्विक ब्लीचिंग 2024 में और गंभीर हुई, जब समुद्री तापमान कई इलाकों में असाधारण स्तर तक पहुंच गया। लगातार गर्म होते समुद्र और बार-बार आने वाली ब्लीचिंग घटनाओं के बीच कोरल को खुद को दोबारा मजबूत करने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में एक और शक्तिशाली अल नीनो उनकी स्थिति और खराब कर सकता है।
क्या इंसानी गतिविधियों से बढ़ रही अल नीनो की ताकत
वैज्ञानिकों के बीच लंबे समय से यह सवाल चर्चा में है कि क्या मानव गतिविधियों के कारण बढ़ रही ग्लोबल वार्मिंग अल नीनो की तीव्रता और आवृत्ति को प्रभावित कर रही है। एक हजार साल पुराने कोरल रिकॉर्ड से मिले संकेत इस बहस को नई दिशा देते हैं। इन रिकॉर्ड में प्रशांत महासागर के पुराने तापमान और जलवायु बदलावों की जानकारी सुरक्षित रहती है। शोधकर्ताओं का मानना है कि औद्योगिक युग से पहले की तुलना में हाल के दौर में शक्तिशाली अल नीनो घटनाओं की स्थिति को समझने के लिए ये रिकॉर्ड महत्वपूर्ण संकेत देते हैं।
हजार साल पुराने कोरल बता रहे हैं जलवायु का इतिहास
पैलियोक्लाइमेट वैज्ञानिक पुराने जलवायु पैटर्न को समझने के लिए कोरल का इस्तेमाल करते हैं। कोरल के कंकाल में समय के साथ समुद्री परिस्थितियों से जुड़े संकेत दर्ज होते रहते हैं। खासतौर पर प्रशांत महासागर के गैलापागोस द्वीप समूह के कोरल वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं, क्योंकि यह क्षेत्र अल नीनो के प्रभावों को समझने के लिहाज से बेहद उपयोगी है। कोरल के मासिक स्तर पर दर्ज संकेत वैज्ञानिकों को अतीत की समुद्री परिस्थितियों का अध्ययन करने में मदद करते हैं।
भविष्य के अल नीनो को लेकर अभी भी बनी हुई है अनिश्चितता
वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु मॉडल आने वाले दशकों में शक्तिशाली अल नीनो की घटनाओं में संभावित बदलाव का संकेत देते हैं, लेकिन भविष्य की सटीक तस्वीर अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। समुद्र और वायुमंडल के बीच होने वाली जटिल प्रक्रियाएं ENSO को प्रभावित करती हैं। हवाओं, समुद्री तापमान और पानी की आवाजाही के बीच बने फीडबैक को पूरी तरह समझना आसान नहीं है। इसी कारण वैज्ञानिक पुराने कोरल रिकॉर्ड को महत्वपूर्ण मानते हैं, लेकिन उसे भविष्य की निश्चित भविष्यवाणी का साधन नहीं मानते।
कोरल रीफ सिर्फ समुद्री सुंदरता नहीं, जीवन का आधार हैं
कोरल रीफ का महत्व केवल समुद्र की खूबसूरती तक सीमित नहीं है। ये समुद्री जैव विविधता के महत्वपूर्ण केंद्र हैं और अनेक मछलियों तथा अन्य जीवों को सुरक्षित आवास प्रदान करती हैं। दुनिया के कई तटीय इलाकों में स्थानीय समुदाय मछली पकड़ने और पर्यटन से अपनी आजीविका चलाते हैं। इसके अलावा कोरल रीफ प्राकृतिक सुरक्षा कवच की तरह काम करती हैं और समुद्री लहरों तथा तूफानों की ताकत को तट तक पहुंचने से पहले कम करने में मदद करती हैं।
कोरल रीफ कमजोर हुईं तो अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा प्रभावित होगी
अगर कोरल रीफ लगातार नष्ट होती रहीं, तो इसका असर समुद्री जैव विविधता के साथ-साथ इंसानी जीवन पर भी पड़ सकता है। मछली उत्पादन में कमी, पर्यटन से होने वाली आय में गिरावट और तटीय समुदायों की आजीविका पर दबाव जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। यही वजह है कि वैज्ञानिक और संरक्षण संगठन ऐसे कोरल की पहचान करने की कोशिश कर रहे हैं, जो ज्यादा गर्म समुद्री परिस्थितियों को सहन कर सकें और बदलती जलवायु में भी जीवित रह सकें।
ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन घटाना ही सबसे बड़ा समाधान
विशेषज्ञों के मुताबिक कोरल रीफ को लंबे समय तक बचाने के लिए ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार कम करना जरूरी है। इसके लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती सबसे अहम कदम है। इसके साथ समुद्री प्रदूषण कम करना, संवेदनशील समुद्री क्षेत्रों की रक्षा करना और नुकसान पहुंचाने वाली मछली पकड़ने की गतिविधियों को नियंत्रित करना भी जरूरी है। इससे कोरल रीफ को जलवायु संबंधी झटकों से उबरने की बेहतर क्षमता मिल सकती है।
भारत में अल नीनो का असर मानसून और खेती पर पड़ सकता है
भारत के लिए अल नीनो की चिंता का एक बड़ा कारण इसका मानसून पर संभावित प्रभाव है। अल नीनो की परिस्थितियां कई बार भारतीय मानसून को कमजोर करने से जुड़ी रही हैं। अगर आने वाले समय में मजबूत अल नीनो विकसित होता है, तो बारिश के वितरण और मात्रा पर असर पड़ने की आशंका रहेगी। इसका प्रभाव खरीफ सीजन की धान और मक्का जैसी फसलों के साथ-साथ बाद की रबी फसलों पर भी पड़ सकता है।
किसानों के लिए मौसम की अनिश्चितता बन सकती है बड़ी चुनौती
मानसून में बदलाव का सीधा असर खेती पर पड़ता है। बारिश कम होने पर सूखे जैसी स्थिति पैदा हो सकती है, जबकि कुछ क्षेत्रों में मौसम के असामान्य पैटर्न के कारण अत्यधिक बारिश और बाढ़ का खतरा भी बढ़ सकता है। ऐसे में किसानों के लिए फसल की योजना बनाना मुश्किल हो जाता है। संभावित मजबूत अल नीनो को देखते हुए मौसम पूर्वानुमान, जल प्रबंधन और कृषि तैयारियों पर विशेष ध्यान देना महत्वपूर्ण होगा।
सुपर अल नीनो की आशंका ने बढ़ाई वैश्विक चिंता
संभावित शक्तिशाली अल नीनो केवल कोरल रीफ के लिए खतरा नहीं है। इसका असर वैश्विक तापमान, समुद्री पारिस्थितिकी, वर्षा के पैटर्न और कृषि व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। वैज्ञानिकों के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि जलवायु परिवर्तन के कारण पहले से गर्म हो चुके समुद्रों को अगर एक और बड़ा तापीय झटका मिलता है, तो कमजोर पारिस्थितिकी तंत्र के लिए उससे उबरना मुश्किल हो सकता है। इसलिए आने वाले समय में निगरानी, शोध और जलवायु कार्रवाई तीनों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रहने वाली है।
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