Nilgiris Tea Crisis: सूखे की मार से चाय उत्पादन 60% तक गिरा, किसानों पर बढ़ा संकट

नीलगिरि की मशहूर चाय पर इस बार मौसम की मार भारी पड़ रही है। दक्षिण-पश्चिम मानसून में 55% बारिश की कमी से मिट्टी की नमी घट गई और हरी पत्तियों का उत्पादन करीब 60% तक कम हो गया। किसानों की नजर अब उत्तर-पूर्व मानसून पर टिकी है, जिससे हालात सुधरने की उम्मीद है।

Nilgiris Tea Crisis : तमिलनाडु के नीलगिरी जिले में दक्षिण-पश्चिम मानसून के कमजोर रहने का सीधा असर चाय उद्योग पर दिखाई दे रहा है। लंबे समय से पर्याप्त बारिश नहीं होने के कारण चाय बागानों की मिट्टी में नमी कम हो गई है। इसका प्रभाव हरी चाय की पत्तियों की नई बढ़त और उत्पादन पर पड़ा है। छोटे चाय उत्पादकों का कहना है कि मौजूदा सीजन में उत्पादन में आई गिरावट पिछले कई दशकों की सबसे गंभीर स्थितियों में से एक है। लगातार कम बारिश ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है।

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500 किलो की जगह अब मिल रही सिर्फ 200 किलो पत्ती

चाय उत्पादकों के मुताबिक, सामान्य परिस्थितियों में जिन बागानों से एक एकड़ में हर महीने करीब 500 किलो तक हरी चाय की पत्तियां मिलती थीं, वहां अब उत्पादन घटकर लगभग 200 किलो रह गया है। इस तरह कई बागानों में उत्पादन करीब 60 प्रतिशत तक कम हो चुका है। मौजूदा सीजन में कुल उत्पादन में लगभग 10 से 20 प्रतिशत की कमी का अनुमान लगाया जा रहा है। यदि आने वाले दिनों में अच्छी बारिश नहीं हुई तो सालाना उत्पादन में गिरावट 50 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।

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सूखे से पौधों को बचाने के लिए स्प्रिंकलर का इस्तेमाल

बारिश की कमी से परेशान कुछ किसानों ने चाय के पौधों को पर्याप्त नमी देने के लिए स्प्रिंकलर सिस्टम का सहारा लिया है। हालांकि, सिंचाई उपकरण खरीदना, उनकी स्थापना करना और लगातार संचालन का खर्च छोटे उत्पादकों के लिए अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन गया है। नीलगिरी के चाय उद्योग में छोटे उत्पादकों की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। ऐसे में लंबे समय तक सूखा रहने पर उनकी आय और उत्पादन लागत के बीच संतुलन बिगड़ने की आशंका बढ़ गई है।

बीच-बीच में बारिश से मिली थोड़ी राहत

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, नीलगिरी में कुछ अंतराल पर हुई बारिश से चाय बागानों को फिलहाल थोड़ी राहत जरूर मिली है। हालांकि, यह बारिश उत्पादन को सामान्य स्तर पर लाने के लिए पर्याप्त नहीं मानी जा रही है। यदि आने वाले दिनों में मौसम में सुधार नहीं हुआ और बारिश का अभाव जारी रहा, तो चाय पौधों की बढ़त पर इसका असर और गंभीर हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक नुकसान का आकलन आगे उत्पादन के आंकड़े आने के बाद ज्यादा स्पष्ट होगा।

कम उत्पादन के साथ कम कीमत की दोहरी मार

चाय किसानों की परेशानी केवल उत्पादन में कमी तक सीमित नहीं है। हरी चाय की पत्तियों की खरीद कीमत भी फिलहाल 20 रुपये प्रति किलो से कम बनी हुई है। ऐसे में किसान एक तरफ कम पत्तियां तोड़ पा रहे हैं और दूसरी ओर उन्हें अपेक्षित कीमत भी नहीं मिल रही है। उत्पादन और बाजार मूल्य दोनों में दबाव के कारण छोटे चाय उत्पादकों की आर्थिक स्थिति प्रभावित हो रही है। यह स्थिति उनके लिए दोहरी चुनौती बन गई है।

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अंतरराष्ट्रीय बाजार से प्रभावित होती हैं चाय की कीमतें

जानकारों के मुताबिक, चाय की कीमत केवल स्थानीय उत्पादन और मांग से निर्धारित नहीं होती, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों का भी उस पर काफी प्रभाव रहता है। इसलिए नीलगिरी में उत्पादन घटने के बावजूद हरी पत्तियों के दाम में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई है। किसानों को उम्मीद थी कि कम आपूर्ति के कारण कीमतों में सुधार होगा, लेकिन बाजार की स्थिति ने उनकी परेशानी कम नहीं की।

दक्षिण-पश्चिम मानसून में करीब 55 प्रतिशत कमी

नीलगिरी के चाय बागानों के लिए दक्षिण-पश्चिम मानसून बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। आमतौर पर यह मानसून जून से अगस्त के बीच सक्रिय रहता है। ऊटी और गुडलूर जैसे क्षेत्रों के चाय बागानों को इस दौरान मिलने वाली बारिश पौधों की वृद्धि के लिए अहम होती है। बताया जा रहा है कि इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान नीलगिरी जिले में कुल मिलाकर करीब 55 प्रतिशत बारिश की कमी दर्ज की गई है।

15 वर्षों में सबसे बड़ी बारिश की कमी का दावा

मौसम और कृषि से जुड़े जानकार इस स्थिति को लेकर गंभीर चिंता जता रहे हैं। उनके अनुसार, दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान नीलगिरी में बारिश की यह कमी पिछले करीब 15 वर्षों में सबसे अधिक बताई जा रही है। हालांकि, कोटागिरी को दक्षिण-पश्चिम के साथ उत्तर-पूर्व मानसून से भी बारिश मिलती है, जबकि कूनूर में उत्तर-पूर्व मानसून की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहती है।

अब उत्तर-पूर्व मानसून से किसानों को बड़ी उम्मीद

कमजोर दक्षिण-पश्चिम मानसून के बाद अब चाय उत्पादकों की नजर उत्तर-पूर्व मानसून पर टिक गई है। किसानों के लिए पर्याप्त बारिश इसलिए जरूरी है, ताकि बागानों की मिट्टी में नमी वापस आ सके और चाय पौधों की नई पत्तियों का विकास तेज हो। यदि आने वाले मौसम में अच्छी बारिश होती है तो उत्पादन में सुधार की उम्मीद की जा सकती है। वहीं, बारिश कमजोर रहने पर किसानों को उत्पादन और आय में और बड़ी गिरावट का सामना करना पड़ सकता है।

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Chandan Das

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