Chhattisgarh High Court: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी महिला को केवल विवाहित होने के आधार पर सरकारी नौकरी के इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक को मृत कर्मचारियों की दो विवाहित बेटियों के दावों पर विचार कर उन्हें उपयुक्त पदों पर नियुक्त करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि आश्रित होने का निर्धारण वैवाहिक स्थिति के बजाय वास्तविक आर्थिक निर्भरता के आधार पर होना चाहिए।
दो विवाहित बेटियों की याचिका पर सुनवाई
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने 30 जुलाई को यह महत्वपूर्ण आदेश पारित किया। बिलासपुर की शीना डेविड और रायपुर की अंकिता मिश्रा ने हाईकोर्ट की एकल पीठ के आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाएं दायर की थीं। दोनों महिलाओं के पिता छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक में सेवा के दौरान दिवंगत हुए थे। बैंक ने उनकी अनुकंपा नियुक्ति के दावों को विवाहित होने के आधार पर स्वीकार नहीं किया था।
एकल पीठ का आदेश हाईकोर्ट ने किया रद्द
खंडपीठ ने सात मई 2026 को एकल पीठ द्वारा दिए गए आदेश को निरस्त कर दिया। इसके साथ ही बैंक को निर्देश दिया गया कि दोनों महिलाओं की शैक्षणिक योग्यता के अनुरूप उपयुक्त पदों पर अनुकंपा नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी की जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि बैंक को आदेश प्राप्त होने के 90 दिनों के भीतर नियुक्ति संबंधी आवश्यक कार्रवाई करनी होगी। महिलाओं की शादी को उनकी नियुक्ति के रास्ते में बाधा नहीं बनाया जा सकता।
बैंक के नियमों में वैवाहिक स्थिति का उल्लेख नहीं
सुनवाई के दौरान अदालत ने बैंक की अनुकंपा नियुक्ति योजना के प्रावधानों का भी परीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि नियमों में आश्रित परिवार के सदस्यों की श्रेणी में पूरी तरह आश्रित पुत्र और पूरी तरह आश्रित पुत्री का उल्लेख है। हालांकि, नियम विवाहित और अविवाहित बेटियों के बीच कोई अलग श्रेणी नहीं बनाते। ऐसे में अदालत ने कहा कि नियमों के अनुसार वास्तविक निर्भरता ही पात्रता निर्धारित करने का आधार है।
शादीशुदा बेटों को लाभ मिलने पर उठे सवाल
मामले की सुनवाई के दौरान बैंक की ओर से यह भी स्वीकार किया गया कि कई विवाहित बेटों को अनुकंपा के आधार पर नौकरी दी गई है। बैंक के वकील ने तर्क दिया कि विवाहित बेटा सामान्य तौर पर अपने माता-पिता के परिवार की जिम्मेदारी निभा सकता है, जबकि शादी के बाद बेटी को उसके ससुराल के परिवार का हिस्सा माना जाता है। हाईकोर्ट ने इस तर्क को सामाजिक धारणा पर आधारित बताते हुए अस्वीकार कर दिया।
अनुच्छेद 14 और 15 का दिया हवाला
अदालत ने कहा कि यदि विवाहित होने के बावजूद बेटे को आश्रित परिवार का सदस्य मानकर अनुकंपा नियुक्ति दी जा सकती है, तो समान स्थिति में बेटी के साथ अलग व्यवहार नहीं किया जा सकता। कोर्ट के अनुसार, केवल विवाह के आधार पर बेटियों को अयोग्य मानना मनमाना और भेदभावपूर्ण है। ऐसा रवैया संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 में निहित समानता के अधिकार के विपरीत होगा।
निर्भरता की वास्तविक स्थिति जांचना जरूरी
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि अधिकारियों ने दोनों महिलाओं के दावे खारिज करने से पहले इस बात की पर्याप्त जांच नहीं की कि वे अपने दिवंगत पिता पर आर्थिक रूप से निर्भर थीं या नहीं। अधिकारियों ने केवल उनके विवाहित होने को आधार मान लिया। अदालत ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति के मामलों में वास्तविक निर्भरता की जांच आवश्यक है और वैवाहिक स्थिति को स्वतः अयोग्यता का आधार नहीं बनाया जा सकता।
दोनों कर्मचारियों की सेवा के दौरान हुई थी मौत
शीना डेविड के पिता नोएल शैलेंद्र कुमार जॉन्स बैंक में शाखा प्रबंधक के पद पर कार्यरत थे, जबकि अंकिता मिश्रा के पिता मंदन कुमार पांडा कार्यालय सहायक थे। दोनों की मृत्यु सेवा अवधि के दौरान हुई थी। हालांकि, उनकी मृत्यु के समय बैंक में अनुकंपा नियुक्ति की योजना लागू नहीं थी। उस समय आश्रित परिवार को अनुग्रह राशि दिए जाने की व्यवस्था थी।
2019 में शुरू हुई अनुकंपा नियुक्ति योजना
बैंक ने वर्ष 2019 में अनुकंपा नियुक्ति की नीति लागू की। बाद में 21 अक्टूबर 2023 के एक परिपत्र के माध्यम से इस योजना का लाभ उन कर्मचारियों के आश्रितों तक भी पिछली तारीख से बढ़ाया गया, जिनकी मृत्यु 11 फरवरी 2014 या उसके बाद सेवा के दौरान हुई थी। इसी प्रावधान के कारण दोनों महिलाओं के दावों पर दोबारा विचार का रास्ता खुला।
90 दिनों में नियुक्ति का निर्देश
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि दोनों अपीलकर्ताओं के दावों की जांच लागू अनुकंपा नियुक्ति योजना के तहत की जानी चाहिए। बैंक केवल इस आधार पर उनके आवेदन खारिज नहीं कर सकता कि योजना के तहत विचार होने से पहले उनकी शादी हो चुकी थी। अदालत ने दोनों को उनकी योग्यता के अनुसार उपयुक्त पद देने और वैवाहिक स्थिति को अयोग्यता नहीं मानने का निर्देश दिया। फैसला विवाहित बेटियों के समान अधिकारों की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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