Groundwater Fish : करीब दो साल पहले सोशल मीडिया पर सामने आए एक छोटे से वीडियो ने वैज्ञानिकों को ऐसी अनोखी मछली की खोज तक पहुंचा दिया, जिसके बारे में पहले विज्ञान को कोई जानकारी नहीं थी। बिहार में मिली यह मछली महज करीब चार सेंटीमीटर लंबी है। इसकी सबसे खास पहचान इसकी आंखें हैं, जो पूरी तरह त्वचा से ढकी हुई दिखाई देती हैं। इसके अलावा इसके शरीर में लगभग कोई रंग नहीं है। वैज्ञानिकों का मानना है कि लगातार अंधेरे वाले भूजल वातावरण में रहने के कारण इसके शरीर में ऐसे विशिष्ट बदलाव विकसित हुए हैं।
नई प्रजाति और नए जीनस के रूप में पहचान
शोधकर्ताओं ने विस्तृत वैज्ञानिक जांच के बाद इस मछली को विज्ञान के लिए नई प्रजाति के रूप में दर्ज किया है। इसे Gangaichthys indonepalicus नाम दिया गया है और इसके लिए एक नया जीनस भी स्थापित किया गया है। इस महत्वपूर्ण खोज से संबंधित शोध को वैज्ञानिक जर्नल ZooKeys में प्रकाशित किया गया है। मछली की शारीरिक बनावट और आनुवंशिक विशेषताओं ने वैज्ञानिकों का विशेष ध्यान आकर्षित किया है।
बोरवेल से सामने आई थी पहली जानकारी
इस अनोखी खोज की शुरुआत वर्ष 2024 में भारत-नेपाल सीमा के नजदीक एक बोरवेल से हुई। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म टिकटॉक पर एक वीडियो में पानी के साथ यह विचित्र मछली बाहर आती दिखाई दी थी। वीडियो देखने के बाद वैज्ञानिकों को संदेह हुआ कि यह कोई सामान्य सतही जल में रहने वाली मछली नहीं हो सकती। इसके बाद शोधकर्ताओं ने बिहार के विभिन्न इलाकों में ऐसे हैंडपंप और बोरवेल तलाशने शुरू किए, जहां भूजल से इस तरह की मछली मिलने की संभावना थी।
कई बोरवेल और हैंडपंप पर चला अभियान
वैज्ञानिकों की टीम ने करीब एक सप्ताह तक अलग-अलग स्थानों पर खोज अभियान चलाया। इस दौरान 15 से अधिक हैंडपंप और बोरवेल से पानी निकालकर मछली की मौजूदगी का पता लगाने की कोशिश की गई। यह आसान काम नहीं था, क्योंकि मछली भूजल की गहराई में रहती थी और उसे सीधे पकड़ना संभव नहीं था। शोधकर्ताओं को पानी की बड़ी मात्रा बाहर निकालकर नमूने हासिल करने पड़े।
करीब 2000 लीटर पानी पंप करने पर मिला पहला नमूना
शोधकर्ताओं को पहले नमूने तक पहुंचने के लिए संबंधित बोरवेल से लगभग 2,000 लीटर पानी बाहर निकालना पड़ा। इसके बाद उसी बोरवेल से करीब 500 लीटर अतिरिक्त पानी पंप करने पर दूसरा नमूना प्राप्त हुआ। शोधकर्ताओं को कुल तीन नमूने मिले। इन्हीं नमूनों के आधार पर मछली की शारीरिक संरचना और आनुवंशिक विशेषताओं का गहराई से अध्ययन किया गया।
माइक्रो-सीटी स्कैन से सामने आई शरीर की संरचना
मछली की पहचान सुनिश्चित करने के लिए वैज्ञानिकों ने आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया। नमूनों पर माइक्रो-सीटी स्कैन किया गया, जिससे शरीर के अंदर मौजूद संरचनाओं का विस्तृत अध्ययन संभव हुआ। इसके साथ ही आनुवंशिक विश्लेषण भी किया गया। दोनों तरह की जांच से प्राप्त परिणामों ने संकेत दिया कि यह पहले से ज्ञात किसी प्रजाति की मछली नहीं, बल्कि विज्ञान के लिए एक नई प्रजाति है।
गंगा बेसिन में पहली भूमिगत मछली होने का दावा
इस खोज को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि Gangaichthys indonepalicus गंगा बेसिन और पूरे इंडो-गैंगेटिक प्लेन के जलोढ़ भूजल तंत्र से दर्ज की गई पहली भूमिगत मछली बताई जा रही है। इससे भारतीय भूजल पारिस्थितिकी और वहां मौजूद जैव विविधता को समझने के लिए एक नया रास्ता खुलता है। वैज्ञानिकों के लिए यह खोज इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भूमिगत जल प्रणालियों में अभी भी कई ऐसे जीव हो सकते हैं, जिनकी पहचान नहीं हो पाई है।
चौधुरीडे परिवार की पहली ज्ञात भूमिगत सदस्य
नई मछली की एक और खासियत यह है कि यह Chaudhuriidae परिवार की पहली ज्ञात भूमिगत सदस्य है। वैज्ञानिकों के अनुसार इसके शरीर में दिखाई देने वाले बदलाव लंबे समय तक अंधेरे वातावरण में रहने के कारण हुए प्राकृतिक अनुकूलन का परिणाम हो सकते हैं। आंखों का सिकुड़ना या त्वचा से ढक जाना तथा शरीर के रंग का लगभग खत्म होना भूमिगत जीवन के अनुरूप विकसित विशेषताएं हो सकती हैं।
अंधेरे भूजल में जीवन के लिए हुआ अनुकूलन
सतही पानी में रहने वाली मछलियों के मुकाबले इस नई प्रजाति की बनावट काफी अलग है। जहां सामान्य मछलियों को रोशनी और आसपास के वातावरण के अनुसार देखने तथा रंग पहचानने की जरूरत होती है, वहीं लगातार अंधेरे में रहने वाले जीवों में ऐसी क्षमताओं की उपयोगिता कम हो सकती है। इसी कारण पीढ़ियों के दौरान शरीर में अलग-अलग विकासवादी बदलाव आ सकते हैं। नई मछली की आंखों और रंगहीन शरीर को भी इसी प्रक्रिया से जोड़कर देखा जा रहा है।
सोशल मीडिया ने दिखाई भूजल की छिपी दुनिया
इस खोज की कहानी यह भी दिखाती है कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली असामान्य जानकारी कभी-कभी वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए महत्वपूर्ण सुराग बन सकती है। एक सामान्य-सा वीडियो वैज्ञानिकों को ऐसे जीव तक ले गया, जो लंबे समय से जमीन के नीचे मौजूद था लेकिन वैज्ञानिक रिकॉर्ड में दर्ज नहीं था। बिहार में हुई यह खोज भारत के भूजल पारिस्थितिकी तंत्र की अनदेखी जैव विविधता को सामने लाने वाली महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।
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