Starlink India Launch : भारत में सैटेलाइट ब्रॉडबैंड सेवाओं के शुरू होने का रास्ता अब तेजी से साफ होता दिखाई दे रहा है। Starlink, OneWeb और Reliance Jio जैसी कंपनियां देश में हाई-स्पीड सैटेलाइट इंटरनेट सेवा शुरू करने की तैयारी में हैं। सूत्रों के मुताबिक, स्पेक्ट्रम आवंटन को लेकर भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण यानी TRAI की सिफारिशों को सचिवों के समूह ने मंजूरी दे दी है। हालांकि, इस संबंध में सरकार की ओर से अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
कैबिनेट की मंजूरी का इंतजार
सूत्रों के अनुसार, सचिवों के समूह से मंजूरी मिलने के बाद प्रस्ताव को अब केंद्रीय मंत्रिमंडल के सामने रखा जा सकता है। कैबिनेट की बैठक में अंतिम मंजूरी मिलने के बाद सैटेलाइट स्पेक्ट्रम आवंटन से जुड़े नियमों को लागू करने का रास्ता खुल जाएगा। इसके बाद कंपनियों के लिए भारत में अपनी कमर्शियल सेवाएं शुरू करने की प्रक्रिया काफी आसान हो सकती है।
Starlink और Jio के पास जरूरी लाइसेंस
Starlink, OneWeb और Reliance Jio जैसी प्रमुख कंपनियों के पास पहले से ही ग्लोबल मोबाइल पर्सनल कम्युनिकेशन बाय सैटेलाइट यानी GMPCS से जुड़े आवश्यक लाइसेंस मौजूद हैं। ऐसे में अब मुख्य मुद्दा स्पेक्ट्रम आवंटन के नियम और उससे जुड़ी फीस पर अंतिम निर्णय का है। कैबिनेट से इन प्रस्तावों को मंजूरी मिलने के बाद कंपनियां व्यावसायिक स्तर पर सेवा शुरू करने के और करीब पहुंच जाएंगी।
पांच साल के लिए मिलेगा स्पेक्ट्रम
TRAI की सिफारिशों के अनुसार, सैटेलाइट ब्रॉडबैंड कंपनियों को शुरुआती तौर पर स्पेक्ट्रम पांच साल की अवधि के लिए आवंटित किया जा सकता है। सरकार बाजार की स्थिति और कंपनियों के प्रदर्शन की समीक्षा के बाद इस अवधि को अतिरिक्त दो साल तक बढ़ाने का विकल्प रख सकती है। इस तरह शुरुआती व्यवस्था अधिकतम सात वर्षों तक जारी रह सकती है।
लंबी अवधि के लाइसेंस की मांग
दुनिया की प्रमुख सैटेलाइट इंटरनेट कंपनियां लंबे समय के लाइसेंस की मांग करती रही हैं। एलन मस्क की Starlink जैसी कंपनियों की ओर से करीब 20 वर्षों की लाइसेंस अवधि की मांग किए जाने की बात सामने आई थी। हालांकि, TRAI ने सैटेलाइट ब्रॉडबैंड को भारत में अभी उभरता हुआ बाजार मानते हुए शुरुआती स्पेक्ट्रम आवंटन की अवधि पांच साल रखने की सिफारिश की है।
सरकार बाजार की स्थिति पर रखेगी नजर
पांच साल की शुरुआती अवधि रखने के पीछे सरकार का उद्देश्य नए बाजार के विकास को करीब से समझना भी है। इस दौरान यह देखा जा सकेगा कि सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं का बाजार किस तरह विकसित होता है और कंपनियां निर्धारित नियमों का कितना पालन करती हैं। इसके साथ ही ग्राहकों की सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मानकों पर भी निगरानी रखी जा सकेगी।
सात साल में बदल सकेंगे नियम
सैटेलाइट इंटरनेट तकनीक तेजी से विकसित हो रही है। ऐसे में सीमित अवधि के लिए स्पेक्ट्रम आवंटित करने से सरकार को भविष्य में तकनीकी बदलावों के अनुरूप नियमों में संशोधन करने की अधिक गुंजाइश मिलेगी। सात साल की अधिकतम अवधि के दौरान सरकार नई तकनीकों, बाजार की प्रतिस्पर्धा और सेवा की गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए अपनी नीतियों को अपडेट कर सकती है।
डेटा सुरक्षा पर भी रहेगी नजर
सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के विस्तार के साथ डेटा सुरक्षा एक महत्वपूर्ण मुद्दा होगा। सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि घरेलू और विदेशी कंपनियां भारतीय डेटा सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े नियमों का गंभीरता से पालन करें। इसलिए स्पेक्ट्रम आवंटन की शर्तों में सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों को महत्वपूर्ण स्थान दिया जा सकता है।
AGR के आधार पर देना होगा शुल्क
TRAI ने शुरुआती पांच साल की अवधि के लिए कंपनियों से स्पेक्ट्रम शुल्क लेने का भी सुझाव दिया है। प्रस्ताव के मुताबिक, कंपनियों के Adjusted Gross Revenue यानी AGR का करीब 4 से 5 प्रतिशत हिस्सा स्पेक्ट्रम शुल्क के रूप में लिया जा सकता है। अंतिम शुल्क और आवंटन व्यवस्था पर फैसला केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी के बाद स्पष्ट होगा।
भारत में सैटेलाइट इंटरनेट का बढ़ेगा दायरा
यदि कैबिनेट से प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है, तो भारत में सैटेलाइट ब्रॉडबैंड सेवाओं के व्यावसायिक लॉन्च की राह काफी हद तक साफ हो जाएगी। इससे खासतौर पर उन ग्रामीण और दूरदराज इलाकों में इंटरनेट कनेक्टिविटी बढ़ाने में मदद मिल सकती है, जहां पारंपरिक नेटवर्क पहुंचाना चुनौतीपूर्ण है। Starlink, OneWeb और Jio जैसी कंपनियों की एंट्री से भारत के ब्रॉडबैंड बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ने की भी संभावना है।
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