Bilaspur High Court : बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने सरकारी सेवा में नियुक्ति के दौरान पुराने आपराधिक मामलों की जानकारी नहीं देने से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल वेरिफिकेशन फॉर्म में आपराधिक मामलों की जानकारी नहीं देने के आधार पर किसी कर्मचारी की सेवा समाप्ति को स्वतः वैध नहीं माना जा सकता। सक्षम प्राधिकारी को कर्मचारी के मामले से जुड़े सभी तथ्यों और परिस्थितियों का निष्पक्ष, तर्कसंगत और समग्र मूल्यांकन करना जरूरी है।
कर्मचारी की वास्तविक उपयुक्तता का करना होगा आकलन
हाई कोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी ने पुराने आपराधिक मामले की जानकारी छिपाई या नहीं बताई, यह एक अलग मुद्दा है। इससे अलग यह तय करना आवश्यक है कि संबंधित व्यक्ति वर्तमान सरकारी सेवा के लिए वास्तव में अनुपयुक्त है या नहीं। अदालत के अनुसार, सेवा समाप्ति का निर्णय लेते समय केवल रिकॉर्ड में सामने आई जानकारी के आधार पर कार्रवाई करने के बजाय मामले की पूरी परिस्थितियों पर विचार किया जाना चाहिए।
हीरा प्रसाद यादव की याचिका पर हुई सुनवाई
यह फैसला हीरा प्रसाद यादव की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया। याचिकाकर्ता के खिलाफ वर्ष 1994 में दो आपराधिक मामले दर्ज हुए थे। उस समय उनकी उम्र करीब 17 वर्ष थी और वह कक्षा 11वीं के छात्र थे। बाद में दोनों मामलों में उन्हें अदालत से बरी कर दिया गया। इस तथ्य को हाई कोर्ट ने मामले की परिस्थितियों के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण माना।
2018 में सहायक प्राध्यापक के पद पर हुआ चयन
करीब दो दशक बाद वर्ष 2018 में हीरा प्रसाद यादव का चयन सहायक प्राध्यापक के पद पर हुआ और उन्होंने सरकारी सेवा ज्वाइन की। इस दौरान उन्होंने एम.कॉम., एम.फिल. और पीएच.डी. जैसी उच्च शैक्षणिक योग्यताएं हासिल कीं। वह छह साल से अधिक समय तक सरकारी सेवा में भी रहे। बाद में चरित्र सत्यापन के दौरान वर्ष 1994 के पुराने आपराधिक मामलों की जानकारी सामने आई।
वेरिफिकेशन फॉर्म और शपथ पत्र को लेकर विभाग की आपत्ति
विभाग की ओर से आरोप लगाया गया कि यादव ने नियुक्ति प्रक्रिया के दौरान वेरिफिकेशन फॉर्म और वर्ष 2018 में दिए गए शपथ पत्र में अपने पुराने आपराधिक मामलों का उल्लेख नहीं किया था। इसी आधार पर उनकी सेवा समाप्त कर दी गई। इसके बाद उन्होंने हाई कोर्ट का रुख किया और बर्खास्तगी के आदेश को चुनौती दी।
उम्र और मामले की पुरानी अवधि को माना महत्वपूर्ण
हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि निर्णय लेते समय कर्मचारी की उस समय की उम्र, अपराध की प्रकृति और गंभीरता, मामले की पुरानी अवधि तथा अदालत से बरी होने के कारण को ध्यान में रखना जरूरी है। इसके साथ ही नियुक्ति के बाद कर्मचारी का आचरण, उसका सेवा रिकॉर्ड और जिस पद पर वह कार्यरत है, उसकी जिम्मेदारियों को भी समग्र रूप से देखना होगा।
केवल Moral Turpitude का उल्लेख पर्याप्त नहीं
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी पुराने अपराध को केवल ‘नैतिक अधमता’ यानी Moral Turpitude की श्रेणी से जोड़ देना ही कर्मचारी को नौकरी से हटाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हो सकता। सक्षम प्राधिकारी को प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों का वस्तुनिष्ठ तरीके से मूल्यांकन करना होगा। इसके बाद ही यह तय किया जा सकता है कि कर्मचारी को सेवा में बनाए रखना उचित है या नहीं।
बर्खास्तगी आदेश को हाई कोर्ट ने किया रद्द
हाई कोर्ट ने पाया कि सेवा समाप्ति के आदेश में यादव की कम उम्र, करीब 30 वर्ष पुराने आपराधिक मामले, दोनों मामलों में बरी होना, उच्च शैक्षणिक योग्यता और छह साल से अधिक के सेवा रिकॉर्ड जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर समग्र रूप से विचार नहीं किया गया। अदालत ने इन परिस्थितियों को देखते हुए 17 फरवरी 2025 के बर्खास्तगी आदेश को रद्द कर दिया।
सेवा में बहाली के साथ वरिष्ठता का मिलेगा लाभ
अदालत ने हीरा प्रसाद यादव को तत्काल सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया। साथ ही उन्हें सेवा की निरंतरता और वरिष्ठता का लाभ देने को कहा गया है। हालांकि, जिस अवधि के दौरान उन्होंने नौकरी नहीं की, उस अवधि का बकाया वेतन देने का आदेश अदालत ने नहीं दिया। हाई कोर्ट के इस फैसले से स्पष्ट होता है कि पुराने आपराधिक मामलों की जानकारी नहीं देने के आरोप पर प्रत्येक मामले में सीधे बर्खास्तगी नहीं की जा सकती, बल्कि परिस्थितियों का समग्र मूल्यांकन आवश्यक है।
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