Ganesh Chaturthi 2026 : साल 2026 में गणेश चतुर्थी का पावन पर्व 14 सितंबर से शुरू होगा। इस दिन देशभर में घरों और सार्वजनिक पंडालों में भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाएगी। गणपति उत्सव के दौरान भगवान गणेश के विभिन्न स्वरूपों की महिमा का स्मरण किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं में उनके आठ प्रमुख अवतारों का विशेष उल्लेख मिलता है। इनका वर्णन मुद्गल पुराण से जुड़ी परंपराओं में बताया जाता है।
वक्रतुंड अवतार ने मत्सरासुर का किया अंत
भगवान गणेश का पहला प्रमुख अवतार वक्रतुंड माना जाता है। इसका अर्थ टेढ़ी सूंड वाले गणेश से जुड़ा है। कथा के अनुसार मत्सरासुर ने कठोर तपस्या के बाद शक्तियां प्राप्त कीं और उसके भीतर ईर्ष्या तथा अहंकार बढ़ने लगा। वह देवताओं और अन्य शक्तियों को परेशान करने लगा। तब गणेश जी ने वक्रतुंड रूप धारण कर उसके अत्याचार और अहंकार को समाप्त किया।
एकदंत अवतार ने मदासुर को पराजित किया
दूसरा प्रमुख स्वरूप एकदंत कहलाता है। इस रूप में भगवान गणेश एक दांत वाले दिखाई देते हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार मदासुर शक्ति मिलने के बाद अपने सामर्थ्य पर घमंड करने लगा था। उसके अहंकार से देवताओं सहित दूसरे लोकों में भी संकट उत्पन्न हुआ। गणेश जी ने एकदंत रूप में उसका सामना किया और उसके मद यानी घमंड का नाश किया।
महोदर रूप ने मोहासुर का प्रभाव खत्म किया
भगवान गणेश का तीसरा अवतार महोदर बताया गया है। महोदर का अर्थ बड़े उदर वाले भगवान गणेश से है। इस स्वरूप की कथा मोहासुर से जुड़ी है, जिसे मोह और भ्रम का प्रतीक माना जाता है। मोह के प्रभाव में व्यक्ति सही और गलत के बीच अंतर करने की क्षमता खो सकता है। गणेश जी ने महोदर रूप धारण कर मोहासुर को पराजित किया।
गजानन अवतार ने लोभासुर को दी शिकस्त
चौथा प्रमुख अवतार गजानन कहलाता है, जिसका अर्थ हाथी के मुख वाले भगवान गणेश से है। इस स्वरूप की कथा लोभासुर से जुड़ी बताई जाती है। लोभासुर अधिक से अधिक पाने की लालसा का प्रतीक माना जाता है। जब लालच आवश्यकता से आगे बढ़ जाता है, तो व्यक्ति विवेक खो सकता है। गजानन रूप में गणेश जी ने लोभासुर के प्रभाव को समाप्त किया।
लंबोदर अवतार ने क्रोधासुर को नियंत्रित किया
भगवान गणेश का पांचवां प्रमुख रूप लंबोदर है। धार्मिक कथा में इसका संबंध क्रोधासुर से बताया गया है। क्रोधासुर अत्यधिक क्रोध और उसके विनाशकारी प्रभाव का प्रतीक माना जाता है। उसके कारण देवताओं के सामने संकट खड़ा हो गया था। गणेश जी ने लंबोदर स्वरूप धारण कर क्रोधासुर को पराजित किया और उसके प्रभाव को नियंत्रित किया।
विकट अवतार ने कामासुर का सामना किया
छठे प्रमुख अवतार के रूप में विकट का वर्णन मिलता है। इसका संबंध कामासुर से जोड़ा जाता है, जिसे अनियंत्रित इच्छाओं और कामनाओं का प्रतीक माना गया है। जब इच्छाएं विवेक पर हावी हो जाती हैं, तब व्यक्ति गलत निर्णय ले सकता है। भगवान गणेश ने विकट रूप में कामासुर का सामना कर उसके प्रभाव को समाप्त किया।
विघ्नराज अवतार ने ममासुर को किया नियंत्रित
सातवां प्रमुख स्वरूप विघ्नराज कहलाता है। भगवान गणेश का यह रूप ममासुर से जुड़ा बताया जाता है। ममासुर को अत्यधिक ममता, आसक्ति और अपनेपन का प्रतीक माना जाता है। किसी व्यक्ति या वस्तु से जरूरत से ज्यादा जुड़ाव जीवन में बाधा बन सकता है। विघ्नराज रूप में गणेश जी ने ममासुर को नियंत्रित किया।
धूम्रवर्ण अवतार ने अहंकारासुर को पराजित किया
आठवां प्रमुख अवतार धूम्रवर्ण माना जाता है। इसका अर्थ धुएं के समान वर्ण वाले गणेश से जुड़ा है। इस रूप की कथा अहंकारासुर से संबंधित है, जिसे अत्यधिक अहंकार और स्वयं को सर्वोच्च समझने की प्रवृत्ति का प्रतीक माना जाता है। गणेश जी ने धूम्रवर्ण रूप धारण कर अहंकारासुर का सामना किया। इन आठों अवतारों की कथाएं मनुष्य को अपने भीतर के विकारों पर नियंत्रण और विवेकपूर्ण जीवन का संदेश देती हैं।
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