Vishwakarma Jayanti 2026 : भगवान विश्वकर्मा की पूजा का पावन पर्व हर वर्ष कन्या संक्रांति के अवसर पर मनाया जाता है। इस वर्ष 17 सितंबर, गुरुवार को विश्वकर्मा पूजा श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यताओं में भगवान विश्वकर्मा को देवशिल्पी कहा गया है। माना जाता है कि उन्होंने अपनी अद्भुत स्थापत्य कला, दिव्य ज्ञान और योगबल से देवताओं के लिए अनेक भव्य भवनों, नगरों और दिव्य वस्तुओं का निर्माण किया था।
देवशिल्पी विश्वकर्मा की अद्भुत निर्माण कला
पौराणिक कथाओं में भगवान विश्वकर्मा को ऐसी दिव्य संरचनाओं का निर्माता बताया गया है, जिनकी कल्पना करना भी सामान्य मनुष्य के लिए कठिन है। उनके द्वारा निर्मित नगरों में भव्य महल, सुंदर उद्यान, मजबूत सुरक्षा व्यवस्था और अद्भुत वास्तुकला का वर्णन मिलता है। सोने की लंका, द्वारका नगरी, इंद्रपुरी और पुष्पक विमान को उनकी प्रमुख रचनाओं में गिना जाता है। इन कथाओं के माध्यम से उनकी असाधारण शिल्पकला और दूरदर्शिता का वर्णन किया गया है।
सोने की लंका के निर्माण की पौराणिक कथा
धार्मिक मान्यता के अनुसार, सोने की लंका का निर्माण भगवान शिव और माता पार्वती के लिए किया गया था। कहा जाता है कि उनके विवाह के बाद विश्राम के लिए भगवान विश्वकर्मा ने इस भव्य नगरी का निर्माण किया था। पूरी लंका को सोने से निर्मित बताया गया है, जिसके कारण इसे स्वर्ण लंका कहा गया। बाद में रावण ने इसे अपने अधिकार में ले लिया था। रामायण की कथा में स्वर्ण लंका का विशेष महत्व बताया गया है।
समुद्र के बीच बनी थी द्वारका नगरी
द्वारका नगरी का निर्माण भगवान श्रीकृष्ण के निर्देश पर भगवान विश्वकर्मा द्वारा किए जाने की मान्यता है। पौराणिक वर्णनों के अनुसार, समुद्र के बीच एक निश्चित क्षेत्र में इस नगरी का निर्माण किया गया था। इसमें सुरक्षा, वास्तुशास्त्र और भव्य स्थापत्य का अद्भुत संयोजन था। मान्यता है कि भगवान विश्वकर्मा ने बेहद कम समय में द्वारका को अत्यंत सुंदर और सुरक्षित नगरी का स्वरूप प्रदान किया। द्वारका की कथा उनकी दिव्य निर्माण क्षमता का महत्वपूर्ण उदाहरण मानी जाती है।
इंद्रपुरी में दिखती थी अद्भुत भव्यता
देवताओं के राजा इंद्र के लिए भगवान विश्वकर्मा द्वारा इंद्रपुरी के निर्माण की कथा भी पुराणों में मिलती है। इसे देवलोक की अत्यंत भव्य नगरी बताया गया है। यहां विशाल महल, सुंदर उद्यान और आकर्षक मार्ग होने का वर्णन मिलता है। धार्मिक कथाओं के अनुसार, इंद्रपुरी की सुंदरता और वैभव देवशिल्पी की अद्भुत वास्तुकला को प्रदर्शित करते थे। देवताओं और ऋषि-मुनियों द्वारा उनकी निर्माण कला की प्रशंसा किए जाने की मान्यता है।
पुष्पक विमान की अद्भुत पौराणिक कहानी
पुष्पक विमान को रामायण काल की सबसे चर्चित दिव्य रचनाओं में से एक माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान विश्वकर्मा ने इसका निर्माण सबसे पहले ब्रह्मदेव के लिए किया था। बाद में यह विमान कुबेर के पास पहुंचा। रामायण की कथा में रावण द्वारा कुबेर से पुष्पक विमान प्राप्त करने का उल्लेख मिलता है। इसके बाद भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने से जुड़ी कथा भी इसी विमान से जोड़ी जाती है।
मन की गति से चलने वाला दिव्य विमान
पुष्पक विमान की सबसे खास विशेषता उसके बारे में कही जाने वाली दिव्य शक्तियां हैं। धार्मिक कथाओं में इसे इच्छानुसार गति और आकार बदलने वाला विमान बताया गया है। मान्यता है कि यह चालक की इच्छा के अनुसार संचालित हो सकता था और अत्यंत तीव्र गति से यात्रा करता था। पौराणिक वर्णनों में इसकी विशेषताओं के माध्यम से भगवान विश्वकर्मा की असाधारण कल्पनाशक्ति और शिल्पकौशल का परिचय मिलता है।
विश्वकर्मा की रचनाएं आज भी आकर्षण का केंद्र
सोने की लंका, द्वारका, इंद्रपुरी और पुष्पक विमान की कथाएं भारतीय पौराणिक परंपरा में भगवान विश्वकर्मा के विशेष स्थान को दर्शाती हैं। विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर श्रद्धालु उनकी शिल्पकला और निर्माण शक्ति का स्मरण करते हैं। धार्मिक मान्यता में उन्हें सृजन, तकनीक, वास्तु और शिल्प का देवता माना जाता है। उनकी दिव्य रचनाओं से जुड़ी कथाएं आज भी लोगों के बीच जिज्ञासा और आस्था का विषय बनी हुई हैं।
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