Ladakh Sea Buckthorn : सी-बकथॉर्न (Sea Buckthorn) को लद्दाख की ‘वंडर बेरी’ और ‘लेह बेरी’ के नाम से भी जाना जाता है। नारंगी और पीले रंग के छोटे-छोटे फलों वाला यह पौधा हिमालय के ठंडे और शुष्क क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है। भारत में इसका सबसे प्रमुख क्षेत्र लद्दाख है, जबकि हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में भी इसकी मौजूदगी देखी जाती है।
लद्दाख में सी-बकथॉर्न की कीमत बढ़ी
सी-बकथॉर्न को लेकर लद्दाख में किसानों और स्थानीय कारोबारियों के लिए महत्वपूर्ण बदलाव हुआ है। सितंबर 2026 में प्रशासन ने किसानों से सी-बकथॉर्न की खरीद के लिए न्यूनतम कीमत बढ़ाकर 300 रुपये प्रति किलोग्राम कर दी। इससे पहले वर्ष इसकी खरीद कीमत 150 रुपये प्रति किलोग्राम थी। कीमत में यह बढ़ोतरी इस फसल के बढ़ते व्यावसायिक महत्व को दर्शाती है।
सी-बकथॉर्न उत्पादों की कीमत भी हुई ज्यादा
कच्चे फल की कीमत बढ़ने का असर इससे तैयार होने वाले उत्पादों पर भी पड़ सकता है। सी-बकथॉर्न से जूस, तेल, जैम, खाद्य पदार्थ और कॉस्मेटिक उत्पाद तैयार किए जाते हैं। बाजार में इसके अलग-अलग उत्पादों की कीमत करीब 700 रुपये से लेकर 3,000 रुपये प्रति लीटर या किलोग्राम तक बताई जाती है। उत्पाद की गुणवत्ता और प्रोसेसिंग के आधार पर कीमत में अंतर हो सकता है।
कठिन मौसम में भी आसानी से टिकता है पौधा
सी-बकथॉर्न को बेहद मजबूत पौधा माना जाता है। यह अत्यधिक ठंड, सूखे और तेज हवाओं जैसी कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रह सकता है। हालांकि, पौधे की यह मजबूती इसकी व्यावसायिक खेती को आसान नहीं बनाती। इसकी खेती मुख्य रूप से ऊंचाई वाले ठंडे रेगिस्तानी इलाकों में होती है, जहां तापमान बहुत कम रहता है और पानी की उपलब्धता भी सीमित होती है।
कांटों के कारण फल तोड़ना बड़ी चुनौती
सी-बकथॉर्न की खेती में सबसे बड़ी चुनौतियों में फल तोड़ना भी शामिल है। पौधे की शाखाओं पर कांटे होते हैं और इसके छोटे फल आसानी से टूट या खराब हो सकते हैं। ऐसे में हाथ से फलों की कटाई करना काफी मुश्किल और समय लेने वाला काम बन जाता है। यही कारण है कि बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए बेहतर तकनीक और उपयुक्त उपकरणों की आवश्यकता होती है।
फल आने में लगते हैं करीब तीन साल
सी-बकथॉर्न के पौधे को फल देने में लगभग तीन साल का समय लग सकता है। एक पौधे से करीब चार किलोग्राम तक फल मिलने की जानकारी दी जाती है। कटाई के बाद ताजे फलों को लंबे समय तक सुरक्षित रखना भी चुनौती है। पहाड़ी इलाकों से बाजार तक पहुंचाने के लिए बेहतर परिवहन व्यवस्था और कोल्ड-चेन की जरूरत होती है।
किसानों के लिए बढ़ रहा आर्थिक महत्व
लद्दाख में सी-बकथॉर्न की न्यूनतम खरीद कीमत बढ़ने से स्थानीय किसानों के लिए इस फसल का आर्थिक महत्व बढ़ सकता है। इसकी मांग खाद्य, पेय, कॉस्मेटिक और अन्य उद्योगों में होने के कारण इससे वैल्यू-एडेड उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। इससे स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण और रोजगार के अवसर भी बढ़ने की संभावना है।
पर्यावरण के लिए भी उपयोगी है सी-बकथॉर्न
सी-बकथॉर्न सिर्फ व्यावसायिक फसल नहीं है, बल्कि पर्यावरण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इसकी जड़ें मिट्टी में नाइट्रोजन जोड़ने में मदद करती हैं। इसके अलावा पौधा मिट्टी के कटाव को रोकने और ठंडे रेगिस्तानी क्षेत्रों के पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने में उपयोगी हो सकता है। यही वजह है कि लद्दाख में इसे प्राकृतिक संसाधन के साथ आर्थिक अवसर के रूप में भी देखा जा रहा है।
सी-बकथॉर्न से किसानों को नई उम्मीद
सी-बकथॉर्न की बढ़ी हुई खरीद कीमत, इसके उत्पादों की मांग और पर्यावरणीय उपयोगिता इसे लद्दाख के लिए महत्वपूर्ण बनाती है। हालांकि, कठिन भौगोलिक परिस्थितियां, कटाई की समस्या, सीमित परिवहन और फलों को सुरक्षित रखने की चुनौती अभी भी मौजूद हैं। बेहतर तकनीक, प्रसंस्करण और बाजार व्यवस्था के जरिए सी-बकथॉर्न स्थानीय किसानों के लिए आय का महत्वपूर्ण स्रोत बन सकता है।
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