CEC Controversy : मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के दो वकीलों ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी से कानूनी कार्रवाई पर विचार करने की मांग की है। अधिवक्ता बृजेश कुमार सिंह और शिव कुमार त्रिपाठी ने अलग-अलग पत्र भेजकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली से जुड़ी मीडिया रिपोर्ट्स का हवाला दिया है। दोनों पत्रों में आयोग की बहु-सदस्यीय व्यवस्था, निर्णय लेने की प्रक्रिया और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्देशों से जुड़े कानूनी सवाल उठाए गए हैं।
बृजेश कुमार सिंह ने मांगी आपराधिक अवमानना की अनुमति
अधिवक्ता बृजेश कुमार सिंह ने अटॉर्नी जनरल से मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की अनुमति देने का अनुरोध किया है। उनके पत्र में मीडिया रिपोर्ट्स का हवाला देते हुए कहा गया है कि यदि उनमें सामने आए तथ्य सही हैं, तो चुनाव आयोग की बहु-सदस्यीय संरचना और निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर गंभीर कानूनी प्रश्न उठ सकते हैं।
आयोग की संस्थागत कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
बृजेश कुमार सिंह ने अपने पत्र में यह भी कहा है कि मीडिया रिपोर्ट्स में बताए गए घटनाक्रम की पुष्टि होने पर आयोग की स्वतंत्रता और संस्थागत कामकाज से जुड़े सवालों की जांच जरूरी हो सकती है। पत्र में चुनाव आयोग की बहु-सदस्यीय व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले निर्धारित सिद्धांतों का भी संदर्भ दिया गया है। हालांकि, ये आरोप और कानूनी मांग अभी संबंधित प्राधिकरण के समक्ष विचाराधीन हैं।
शिव कुमार त्रिपाठी ने भी भेजा प्रतिनिधित्व
अधिवक्ता शिव कुमार त्रिपाठी ने 24 सितंबर को अटॉर्नी जनरल को अलग प्रतिनिधित्व भेजा। इसमें उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ संभावित आपराधिक अवमानना और संवैधानिक कदाचार के पहलुओं की जांच की मांग की है। त्रिपाठी ने 23 सितंबर को प्रकाशित इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट का भी हवाला दिया, जिसमें चुनाव आयुक्तों की ओर से कथित आपत्तियों का विवरण दिया गया था।
दो चुनाव आयुक्तों की 14 आपत्तियों की रिपोर्ट
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर आयोग के कुछ फैसलों और कदमों को लेकर आपत्ति दर्ज की थी। रिपोर्ट में कहा गया कि इनमें कुछ ऐसे फैसले भी शामिल थे, जिन्हें दोनों अधिकारियों ने अपनी जानकारी या मंजूरी के बिना जारी किए जाने की बात कही थी।
मतदाता सूची और Form-6 से जुड़े मुद्दे
रिपोर्ट में जिन मुद्दों का उल्लेख किया गया, उनमें नए मतदाताओं का पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाना या बहाल करना, Form-6 में बदलाव और चुनावी डेटा के प्रबंधन से जुड़े विषय शामिल हैं। इसके अलावा मतदाता डेटाबेस तक पहुंच और उसके केंद्रीकरण को लेकर भी आपत्तियां दर्ज किए जाने की बात सामने आई है।
आधिकारिक रिकॉर्ड से सत्यापन की मांग
शिव कुमार त्रिपाठी ने अटॉर्नी जनरल से मीडिया रिपोर्ट्स में सामने आए तथ्यों को चुनाव आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड से सत्यापित कराने का अनुरोध किया है। उनका कहना है कि इसके बाद ही यह निर्धारित किया जा सकेगा कि रिपोर्ट में बताए गए घटनाक्रम और आयोग की संवैधानिक कार्यप्रणाली के बीच कोई कानूनी विरोधाभास है या नहीं।
अनुच्छेद 324 का दिया गया हवाला
त्रिपाठी के पत्र में संविधान के अनुच्छेद 324 का भी उल्लेख किया गया है। इसके तहत चुनाव आयोग को चुनावों की निगरानी, निर्देशन और नियंत्रण की संवैधानिक जिम्मेदारी दी गई है। पत्र में यह सवाल उठाया गया है कि यदि आयोग के किसी सदस्य द्वारा कथित तौर पर एकतरफा तरीके से अधिकारों का इस्तेमाल किए जाने की पुष्टि होती है, तो क्या वह आयोग की बहु-सदस्यीय संस्थागत व्यवस्था से जुड़े न्यायिक सिद्धांतों के अनुरूप होगा।
अवमानना के कानूनी पहलू पर राय मांगी
शिव कुमार त्रिपाठी ने अटॉर्नी जनरल से यह भी विचार करने का अनुरोध किया है कि यदि मीडिया रिपोर्ट में लगाए गए आरोप आधिकारिक रिकॉर्ड से प्रमाणित होते हैं, तो क्या ऐसी स्थिति में सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी न्यायिक सिद्धांतों की कथित अवहेलना का प्रश्न उठ सकता है। उन्होंने इसी आधार पर संभावित अवमानना कार्यवाही की कानूनी संभावना पर राय मांगी है।
चुनाव आयोग ने फैसलों को बताया सर्वसम्मत
इस पूरे विवाद के बीच चुनाव आयोग ने मीडिया रिपोर्ट में बताए गए मतभेदों पर अपना पक्ष भी रखा है। आयोग ने कहा है कि आंतरिक विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय या टिप्पणियां बहु-सदस्यीय संस्था की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं। आयोग के अनुसार SIR समेत पिछले एक साल के महत्वपूर्ण फैसले पूर्ण आयोग की सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
अब अटॉर्नी जनरल के जवाब पर नजर
दोनों वकीलों की ओर से भेजे गए पत्रों के बाद अब मामले में अटॉर्नी जनरल की ओर से संभावित कानूनी राय महत्वपूर्ण होगी। फिलहाल मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ किसी न्यायिक कार्रवाई का अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है। मामले का अगला चरण इस बात पर निर्भर करेगा कि प्रस्तुत आरोपों और मीडिया रिपोर्ट्स में बताए गए तथ्यों का आधिकारिक रिकॉर्ड से क्या सत्यापन होता है।
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