Allahabad High Court : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वयस्क बेटी की स्वतंत्रता और उसकी पसंद को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि माता-पिता बंदी प्रत्यक्षीकरण यानी Habeas Corpus याचिका का इस्तेमाल अपनी बालिग बेटी को उसकी इच्छा के विरुद्ध अपने साथ रहने के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से नहीं कर सकते। कोर्ट ने कहा कि 18 वर्ष से अधिक उम्र की महिला अपने जीवन और रहने की जगह को लेकर स्वयं निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है।
कलावती देवी ने दाखिल की थी याचिका
यह मामला कलावती देवी की ओर से दाखिल की गई बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से जुड़ा है। याचिका में उन्होंने अपनी 25 वर्षीय बेटी कुमारी पूजा को अदालत के समक्ष पेश कराने की मांग की थी। उनका कहना था कि बेटी को उनके सामने पेश किया जाए और वह उनके साथ रहे। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति संदीप जैन की पीठ ने की।
अदालत के आदेश पर पेश की गई पूजा
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने 17 अगस्त 2026 को राज्य को पूजा को अदालत के सामने पेश करने का निर्देश दिया था। अदालत के निर्देश का पालन करते हुए पूजा को बाद में हाईकोर्ट के समक्ष पेश किया गया। इसके बाद न्यायाधीश ने उससे सीधे बातचीत की और उसकी इच्छा तथा वर्तमान स्थिति के बारे में जानकारी ली।
पूजा ने कहा- अपनी मर्जी से दिल्ली में रह रही हूं
अदालत के समक्ष पूजा ने बताया कि वह अपनी इच्छा से दिल्ली में रह रही है और उसे किसी व्यक्ति ने अवैध तरीके से हिरासत में नहीं रखा है। उसने स्पष्ट किया कि वह अपनी मां के साथ रहना नहीं चाहती। पूजा ने अदालत के सामने यह भी कहा कि वह स्वतंत्र रूप से अपना जीवन जी रही है और उसके रहने पर किसी तरह का जबरन नियंत्रण नहीं है।
मां पर मारपीट और गाली देने का आरोप
पूजा ने अपनी मां के व्यवहार को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए। उसके अनुसार, घर में रहने के दौरान उसकी मां अक्सर उसके साथ मारपीट करती थीं और उसे गालियां देती थीं। पूजा ने कहा कि मां का उसके प्रति व्यवहार सौहार्दपूर्ण नहीं था। हालांकि, कलावती देवी ने बेटी की ओर से लगाए गए इन आरोपों से इनकार किया और अदालत के समक्ष अपना पक्ष रखा।
मां ने कहा- बेटी को माता-पिता के साथ रहना चाहिए
कलावती देवी की ओर से यह दलील दी गई कि उनकी बेटी को अपने माता-पिता के साथ रहना चाहिए। उन्होंने अपनी बेटी को अदालत के समक्ष पेश किए जाने की मांग इसी आधार पर की थी। दूसरी ओर, पूजा ने साफ तौर पर अपनी इच्छा जाहिर करते हुए कहा कि वह अपनी मां के साथ रहने के लिए तैयार नहीं है और दिल्ली में अपनी मर्जी से रह रही है।
बालिग होने के कारण पूजा का फैसला महत्वपूर्ण
अदालत ने पूजा के बयान और परिस्थितियों पर गंभीरता से विचार किया। हाईकोर्ट ने पाया कि पूजा 25 वर्ष की वयस्क महिला है और वह अपने रहने की जगह तथा व्यक्ति का चुनाव करने के लिए कानूनी रूप से स्वतंत्र है। जब उसने अदालत के सामने स्पष्ट कर दिया कि वह अपनी इच्छा से रह रही है और अवैध हिरासत में नहीं है, तो बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के आधार पर उसे मां के साथ रहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने खारिज की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका
इन परिस्थितियों को देखते हुए न्यायमूर्ति संदीप जैन ने 28 सितंबर को कलावती देवी की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज कर दी। अदालत के इस फैसले में वयस्क व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और उसकी पसंद को प्रमुखता दी गई। कोर्ट की टिप्पणी से यह स्पष्ट होता है कि केवल माता-पिता की इच्छा के आधार पर किसी बालिग बेटी को उसके चुने हुए स्थान या व्यक्ति के साथ रहने से रोका नहीं जा सकता।
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