African Swine Fever Vaccine: भारतीय पशु चिकित्सा विज्ञान ने एक और बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए अफ्रीकन स्वाइन फीवर (ASF) के खिलाफ स्वदेशी वैक्सीन विकसित कर ली है। नई दिल्ली में आयोजित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के 98वें स्थापना दिवस समारोह में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस अत्याधुनिक वैक्सीन को राष्ट्र को समर्पित किया। इस टीके का निर्माण भोपाल स्थित राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशुरोग संस्थान (NIHSAD) के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है। इस गौरवपूर्ण यात्रा में छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले का महत्वपूर्ण योगदान रहा, क्योंकि इस वैक्सीन का पहला सफल फील्ड ट्रायल अंबिकापुर स्थित शासकीय सुकर फार्म सकालो में किया गया।

सरगुजा में सफल ट्रायल: विज्ञान की नई उड़ान
शासकीय सुकर फार्म सकालो के प्रबंधक डॉ. अजय अग्रवाल और पशु चिकित्सा सेवाएं के अतिरिक्त उप संचालक डॉ. सीके मिश्रा ने जानकारी दी कि वैक्सीन का फील्ड ट्रायल मार्च 2026 में शुरू हुआ था। यह परीक्षण भोपाल के वैज्ञानिकों—डॉ. राजू कुमार, डॉ. सैंथिल, डॉ. वेंकटेश और फतेह सिंह—की देखरेख में संपन्न हुआ। ट्रायल के दौरान वैक्सीन के सुरक्षा मानकों, प्रतिरक्षण क्षमता और प्रभावशीलता का कड़ाई से मूल्यांकन किया गया। अंबिकापुर के सुअरों पर किया गया यह परीक्षण पूरी तरह सफल रहा, जिसने वैक्सीन के व्यावसायिक उपयोग का मार्ग प्रशस्त किया।

वैक्सीन की अनूठी विशेषताएं और प्रभावकारिता
यह वैक्सीन दुनिया की पहली ‘एमए-104 कोशिका-आधारित जीवित क्षीणीकृत वैक्सीन’ (Live Attenuated Vaccine) है। इसे व्यावसायिक रूप से उपलब्ध सेल लाइनों पर विकसित किया गया है, जिससे इसका बड़े पैमाने पर और कम लागत में उत्पादन करना संभव होगा। उपयोग विधि के अनुसार, इसकी मात्र एक मिलीलीटर खुराक गर्दन की मांसपेशियों में दी जाती है, जिसके 14 दिनों बाद बूस्टर डोज लगाई जाती है। यह वैक्सीन आठ सप्ताह से अधिक आयु के सुअरों के लिए सुरक्षित है और करीब छह महीने तक प्रभावी रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस वैक्सीन में वायरस के पुनः सक्रिय होने या रोगजनक बनने का कोई खतरा नहीं है।
अफ्रीकन स्वाइन फीवर: सुअर पालकों के लिए काल का दूसरा नाम
वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉ. अजय अग्रवाल के अनुसार, अफ्रीकन स्वाइन फीवर सुअरों में होने वाला एक अत्यंत घातक वायरल रोग है, जिसमें मृत्यु दर लगभग 100 प्रतिशत तक होती है। वर्ष 2020 में भारत में पहली बार इस बीमारी की पुष्टि हुई थी। तब से यह देश के कई राज्यों में फैलकर पशुपालकों के लिए एक बड़ा आर्थिक संकट बन गई थी। अब तक इसका कोई प्रभावी उपचार उपलब्ध नहीं था और संक्रमित सुअरों को मारना ही एकमात्र विकल्प बचा था। यह वैक्सीन अब इस बीमारी को नियंत्रित करने का सबसे सशक्त माध्यम साबित होगी।
आदिवासी अंचलों की अर्थव्यवस्था को मिलेगा संबल
पशु चिकित्सा विभाग के डॉ. सीके मिश्रा ने कहा कि यह भारत का पहला सफल एएसएफ फील्ड ट्रायल था। वर्तमान में विश्व के अधिकांश देशों में इस बीमारी की कोई अधिकृत व्यावसायिक वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। ऐसे में भारत की यह सफलता वैश्विक स्तर पर मिसाल है। सरगुजा जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्रों में, जहां सुअर पालन आजीविका का मुख्य आधार है, वहां के पशुपालकों को इस वैक्सीन से सीधा लाभ होगा। यह टीका न केवल सुअरों को जानलेवा बीमारी से बचाएगा, बल्कि पशुपालकों को होने वाले भारी आर्थिक नुकसान से भी राहत दिलाएगा। भारत के इस वैज्ञानिक नवाचार से देश के लाखों किसानों का भविष्य सुरक्षित होगा।
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