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AI Chatbot Danger for Kids: बच्चों के लिए जहर बन रहे हैं AI चैटबॉट्स, अश्लीलता का लगा अंबार

AI Chatbot Danger for Kids:  आज के डिजिटल युग में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) चैटबॉट्स तकनीक की दुनिया में क्रांति ला रहे हैं। मनोरंजन से लेकर पढ़ाई तक, ये हर जगह अपनी जगह बना चुके हैं। लेकिन हाल ही में ‘eSafety Commissioner’ द्वारा किए गए एक अध्ययन ने पूरी दुनिया के माता-पिता की नींद उड़ा दी है। इस रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि कई लोकप्रिय AI चैटबॉट प्लेटफॉर्म बच्चों को सुरक्षित वातावरण देने में बुरी तरह विफल साबित हुए हैं। ये ऐप्स न केवल बच्चों को असुरक्षित महसूस कराते हैं, बल्कि उन्हें ऐसे कंटेंट की ओर धकेल रहे हैं जो उनके मानसिक और नैतिक विकास के लिए बेहद हानिकारक है।

इन ऐप्स की सुरक्षा पर उठे सवाल: घेरे में आए नामी प्लेटफॉर्म्स

जांच रिपोर्ट में विशेष रूप से Character.AI, Chai, Nomi और Chub AI जैसे प्लेटफॉर्म्स का उल्लेख किया गया है। इन ऐप्स में बच्चों की सुरक्षा को लेकर कई गंभीर खामियां और सुरक्षा छिद्र (Security Loopholes) पाए गए हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन प्लेटफॉर्म्स पर ‘एज वेरिफिकेशन’ (उम्र का सत्यापन) जैसी कोई सख्त व्यवस्था नहीं है। इसके अभाव में बच्चे बड़ी ही आसानी से उन वयस्क फीचर्स और चैट रूम्स तक पहुँच बना रहे हैं, जो उनके लिए प्रतिबंधित होने चाहिए। यह स्थिति बच्चों को साइबर अपराधों और शोषण के प्रति संवेदनशील बना रही है।

सुरक्षा तंत्र में बड़ी चूक: उम्र के सत्यापन का कोई पुख्ता आधार नहीं

रिपोर्ट के मुताबिक, इन ऐप्स का सुरक्षा मॉडल पूरी तरह से यूजर की ईमानदारी पर निर्भर है। साइनअप के दौरान यूजर जो भी उम्र भर देता है, ऐप उसी पर भरोसा कर लेता है। इसका फायदा उठाकर कोई भी बच्चा गलत जानकारी देकर इन सेवाओं का इस्तेमाल शुरू कर देता है। इसके अलावा, रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि कुछ ऐप्स में ‘सेल्फ-हार्म’ (स्वयं को नुकसान पहुँचाना) से जुड़ी बातें होने पर भी सिस्टम कोई चेतावनी जारी नहीं करता। किसी आपातकालीन मदद या हेल्पलाइन का विकल्प न होना इन ऐप्स को बच्चों के लिए मौत का जाल बना सकता है।

अनियंत्रित संवाद: अश्लील इमेज और वीडियो का बढ़ता खतरा

इन चैटबॉट्स के साथ बातचीत केवल टेक्स्ट तक सीमित नहीं है; यहाँ इमेज और वीडियो के माध्यम से भी संवाद होता है। निगरानी (Moderation) की कमी के कारण ये ऐप्स अक्सर आपत्तिजनक या गैरकानूनी कंटेंट जनरेट करने लगते हैं। विशेषज्ञों ने पाया कि कई प्लेटफॉर्म्स पर यूजर्स को यह स्पष्ट नहीं किया जाता कि अपराध या हिंसा से जुड़ी सामग्री की मांग करना कानूनन जुर्म है। निगरानी के अभाव में AI मॉडल अक्सर अनैतिक बातें करने लगते हैं, जो बच्चों के कोमल मस्तिष्क पर गहरा और नकारात्मक प्रभाव छोड़ सकती हैं।

मनोवैज्ञानिक जुड़ाव: क्यों बच्चे जल्दी बन जाते हैं शिकार?

विशेषज्ञों का कहना है कि ये AI बॉट्स बच्चों को ‘इंसानी’ अनुभव देते हैं। वे एक दोस्त, गुरु या गुप्त साथी की तरह व्यवहार करते हैं, जिससे बच्चे भावनात्मक रूप से उनसे जुड़ जाते हैं। समस्या यह है कि ये बॉट्स न तो बच्चों के मनोविज्ञान को समझते हैं और न ही वे मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ हैं। इसके बावजूद, वे संवेदनशील और गंभीर विषयों पर सलाह देने लगते हैं। बच्चों को लगता है कि वे किसी असली इंसान से बात कर रहे हैं, जबकि पीछे चल रहा एल्गोरिदम उन्हें गलत दिशा में ले जा सकता है।

भारत में बढ़ता जोखिम: स्मार्टफोन की आसान पहुँच और लापरवाही

भारत में सस्ते डेटा और हर हाथ में स्मार्टफोन होने के कारण इन ऐप्स का प्रसार बहुत तेजी से हो रहा है। भारतीय बाजार में ये ऐप्स अक्सर ‘एजुकेशनल टूल’ या ‘पर्सनल असिस्टेंट’ के रूप में खुद को पेश करते हैं, जिससे माता-पिता को इन पर शक नहीं होता। युवा पीढ़ी अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए इन प्लेटफॉर्म्स का सहारा ले रही है, लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि वे एक डिजिटल दलदल में फंस रहे हैं। भारत में साइबर सुरक्षा कानूनों के प्रति जागरूकता की कमी इस खतरे को और भी बढ़ा देती है।

माता-पिता के लिए सुझाव: कैसे रखें अपने बच्चों को सुरक्षित?

तकनीक को पूरी तरह प्रतिबंधित करना समाधान नहीं है, लेकिन सतर्कता बहुत जरूरी है। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों के साथ संवाद का एक खुला रास्ता रखें। उनसे पूछें कि वे कौन से ऐप्स इस्तेमाल कर रहे हैं और वहाँ किस तरह की बातें होती हैं। उनकी ऑनलाइन गतिविधियों पर जासूसी के बजाय ‘भरोसेमंद निगरानी’ रखें। बच्चों को डिजिटल साक्षरता और ऑनलाइन खतरों के बारे में शिक्षित करना ही इस नई तकनीक के दौर में उन्हें सुरक्षित रखने का सबसे प्रभावी तरीका है। सजगता ही सबसे बड़ी सुरक्षा है।

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