AI Jobs Impact : भारतीय जॉब मार्केट में इस समय आईटी, कानून, वाणिज्य, अनुवाद, डिजाइन और पुस्तकालय विज्ञान जैसे प्रमुख क्षेत्रों में एक बड़ा उलटफेर शुरू हो चुका है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के आधुनिक टूल्स ने उन बुनियादी कामों को या तो पूरी तरह खत्म कर दिया है या बेहद सीमित कर दिया है, जिनके लिए देश के लाखों छात्र हर साल भारी-भरकम फीस देकर डिग्रियां लेते हैं। प्रमुख एचआर कंपनी ‘टीमलीज’ का कहना है कि आज 40% कंपनियां केवल पारंपरिक डिग्री के बजाय ‘हाइब्रिड स्किल’ यानी डिग्री के साथ-साथ AI टूल्स की व्यावहारिक जानकारी को अनिवार्य मानती हैं।

वहीं नैस्कॉम की रिपोर्ट के अनुसार, देश के 82% बीसीए और एमसीए स्नातकों के पास AI टूल्स की कोई औपचारिक ट्रेनिंग नहीं है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम और आईबीएम के मुताबिक, भविष्य में नौकरियां केवल उन्हीं के पास सुरक्षित रहेंगी जो AI टूल्स की मदद से अपनी उत्पादकता को 40% तक बढ़ा सकते हैं। ‘फ्यूचर ऑफ जॉब्स रिपोर्ट 2025’ की मानें तो 2030 तक करीब 22% मौजूदा नौकरियां इससे प्रभावित हो सकती हैं।

एक्सपर्ट पंकज बंसल से जानिए पारंपरिक डिग्री धारकों और फ्रेशर्स का भविष्य
टेक कंपनी ‘पीपुलस्ट्रॉन्ग’ और ‘टैग्ड’ के सह-संस्थापक पंकज बंसल का मानना है कि पारंपरिक डिग्रियां पूरी तरह बेकार नहीं होंगी, लेकिन यदि पढ़ाई का थ्योरी थकाऊ तरीका नहीं बदला गया, तो इनकी कोई वैल्यू नहीं बचेगी। वर्तमान में सेकंड या थर्ड ईयर में पढ़ रहे छात्रों को AI टूल्स का प्रोफेशनल लाइसेंस लेकर लाइव प्रोजेक्ट्स पर काम करना चाहिए। वहीं डिग्री पूरी कर चुके युवाओं के लिए इंटर्नशिप और स्थानीय स्तर पर प्रैक्टिकल प्रोजेक्ट्स के जरिए समस्याओं को AI से सुलझाना सबसे बेहतरीन रास्ता है।
अगले 3 से 5 साल तक भारत में नौकरियों के लिए ग्रेजुएशन की डिग्री जरूरी रहेगी, लेकिन इसके बाद न्यू एजुकेशन पॉलिसी (NEP) का ‘5.5 क्रेडिट स्कोर’ इसे रिप्लेस कर देगा। आज कंपनियां औसत लोगों के बजाय ‘10x प्रोफेशनल’ को पसंद कर रही हैं, जो अकेले 10 लोगों का काम संभाल सके। ऐसे कुशल पेशेवरों को कंपनियां 5 लाख के बजाय 25 लाख रुपये तक का शुरुआती पैकेज देने को तैयार हैं।
आईटी कंपनियों में भर्तियों की स्थिति और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स का नया विकल्प
शुरुआती दौर में एंट्री लेवल या फ्रेशर्स की जॉब्स पर दबाव जरूर दिख रहा है, क्योंकि जो काम पहले 10 लोग करते थे, वह अब दो लोग AI की मदद से निपटा रहे हैं। यही वजह है कि इंफोसिस, विप्रो और टीसीएस जैसी पारंपरिक कंपनियों ने शुरुआत में फ्रेशर्स की हायरिंग को कुछ समय के लिए टाला है, लेकिन यह केवल एक शॉर्ट-टर्म ट्रेंड है। नए युवाओं के लिए इस समय भारत में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) की बाढ़ आई हुई है। देश में 4000 से ज्यादा जीसीसी सक्रिय हैं और हर हफ्ते दो नए सेंटर खुल रहे हैं, जो AI स्किल्स वाले युवाओं को भारी पैकेज पर हायर कर रहे हैं। इसके अलावा, अब यह भी साबित हो रहा है कि AI की टोकन और जीपीयू प्रोसेसिंग लागत इंसानी लागत से कम नहीं है, जिसके कारण कई स्टार्टअप्स टूल्स के बजाय इंसानों को तरजीह दे रहे हैं।
मानवीय खूबियों की अहमियत और वैश्विक स्तर पर शिक्षा पद्धतियों में बड़ा बदलाव
पंकज बंसल के अनुसार, AI के इस युग में चार मानवीय खूबियां सबसे कीमती साबित होंगी— चीजों को आपस में जोड़ने की समझ (एग्रीगेशन एबिलिटी), निर्णय क्षमता (डिसीजन मेकिंग), हाई इमोशनल कोशेंट (EQ) और प्रभावी संवाद कौशल। हॉस्पिटैलिटी, डेटा साइंसेज, सेल्स और AI की समझ रखने वाले डॉक्टरों व पत्रकारों के रोल्स हमेशा सुरक्षित रहेंगे। इस बदलाव के बीच वैश्विक स्तर पर शिक्षा व्यवस्था में बड़े कदम उठाए जा रहे हैं।
चीन ने 2021 से 2025 के बीच अपने विश्वविद्यालयों के 12,200 से अधिक पारंपरिक अंडरग्रेजुएट प्रोग्राम्स को रद्द या निलंबित कर दिया है और उनकी जगह 10,200 नए AI, सेमीकंडक्टर्स और रोबोटिक्स से जुड़े रणनीतिक कोर्स शुरू किए हैं। इसी तर्ज पर भारत में भी कर्नाटक सरकार ने कम दाखिले के कारण शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए सरकारी कॉलेजों में 458 पारंपरिक बीए, बीएससी, बीकॉम कॉम्बिनेशन्स को बंद करते हुए 1,300 से अधिक सीटों में कटौती की है।
Bihar Politics : तीन नोटिस और अल्टीमेटम खत्म, लालू परिवार ने क्यों खाली नहीं किया सरकारी बंगला?











