Sarguja News : अंबिकापुर पशुपालन विभाग में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां एक सरकारी कर्मचारी को बिना किसी ठोस जांच और सबूतों के 1.07 करोड़ रुपये के गबन के आरोप में 100 दिनों तक जेल की हवा खानी पड़ी। सहायक ग्रेड-2 के पद पर कार्यरत प्रदीप कुमार अंबष्ट के खिलाफ प्रभारी उप संचालक डॉ. आरपी शुक्ला ने फरवरी 2026 में कोतवाली थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई थी। आरोप था कि पांच सदस्यीय विभागीय जांच समिति की रिपोर्ट में गबन की पुष्टि हुई है। पुलिस ने बिना गहन जांच के तुरंत कार्रवाई करते हुए प्रदीप कुमार को गिरफ्तार कर लिया। लेकिन, जब पुलिस ने अदालत में चालान पेश किया, तो पूरी साजिश का पर्दाफाश हो गया। सच्चाई यह थी कि न तो कोई जांच रिपोर्ट थी और न ही गबन का कोई दस्तावेजी सबूत।

पुलिस की चालान में खुली पोल, जांच रिपोर्ट थी ही नहीं
पुलिस द्वारा 29 मई 2026 को अदालत में प्रस्तुत किए गए चालान ने इस पूरे प्रकरण पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। चालान में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि “गबन की जांच किया जाना नहीं पाया गया।” विवेचना के दौरान जब पुलिस ने डॉ. आरपी शुक्ला से दस्तावेज मांगे, तो उन्होंने कोई भी कागजात प्रस्तुत नहीं किए। यहाँ तक कि जांच समिति के सदस्यों ने भी अपने बयानों में स्वीकार किया कि उन्होंने कभी जांच की ही नहीं, क्योंकि उन्हें प्रकरण से संबंधित दस्तावेज ही उपलब्ध नहीं कराए गए थे। बिना रिपोर्ट के एफआईआर दर्ज कराकर एक कर्मचारी को जेल भेजने की यह कार्रवाई अब अधिकारियों की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न खड़ा कर रही है।

कर्मचारी ने पहले ही जताई थी साजिश की आशंका
प्रदीप कुमार अंबष्ट ने अपनी गिरफ्तारी से काफी पहले, दिसंबर 2025 में ही राज्य के आला अधिकारियों, कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को पत्र लिखकर आशंका जताई थी कि उन्हें फंसाने की एक सुनियोजित साजिश रची जा रही है। उन्होंने स्पष्ट किया था कि कार्यालय की कैश बुक घर ले जाने की अनुमति वे नहीं देंगे, जबकि अन्य दस्तावेज कोई भी देख सकता है। इसके बावजूद, प्रभारी उप संचालक ने बिना किसी आधार के उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करा दी। दिलचस्प बात यह है कि चार्ज लेने के चार महीने बाद भी अधिकारी ने कोई साक्ष्य नहीं जुटाए, जिससे यह कार्रवाई पूरी तरह से व्यक्तिगत द्वेष और द्वेषपूर्ण प्रतीत होती है।
पीएमओ और आईजी की सख्त नाराजगी, नए सिरे से होगी जांच
इस अन्याय के खिलाफ प्रदीप कुमार के परिजनों ने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद सरगुजा कलेक्टर को जांच के आदेश मिले हैं। वहीं, सरगुजा रेंज के पुलिस महानिरीक्षक (IG) दीपक कुमार झा ने भी इस मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई है। आईजी ने एसपी से स्पष्टीकरण मांगा है कि बिना जांच रिपोर्ट के सरकारी कर्मचारी की गिरफ्तारी में इतनी जल्दबाजी क्यों की गई? उन्होंने इस मामले में शामिल विवेचना अधिकारी के खिलाफ भी जांच के निर्देश दिए हैं। पूर्व में भी तत्कालीन कलेक्टर के समय हुई जांच के दौरान दस्तावेज उपलब्ध न करा पाने वाले डॉ. शुक्ला की भूमिका अब जांच के घेरे में है। पीएमओ और आईजी के हस्तक्षेप से अब पीड़ित कर्मचारी को न्याय मिलने की उम्मीद जगी है।
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