Ambikapur Rail Line : छत्तीसगढ़ के उत्तरवर्ती सरगुजा अंचल को राष्ट्रीय रेल नेटवर्क से जोड़ने का सपना अब भी अधूरा है, जबकि 26 जुलाई 2024 को राज्य विधानसभा ने अंबिकापुर-रेणुकूट रेल लाइन को सर्वसम्मति से पारित कर ऐतिहासिक पहल की थी। इसके एक वर्ष बाद भी यह महत्वाकांक्षी परियोजना अंतिम स्वीकृति की प्रतीक्षा में है। हालांकि रेलवे मंत्रालय के निर्देश पर फाइनल लोकेशन सर्वे पूरा कर विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) अक्टूबर 2023 को रेलवे बोर्ड को सौंप दी गई है, परंतु राज्य सरकार व अन्य संबंधित संस्थाओं से अनुमोदन की प्रक्रिया अब भी प्रगति पर है।
परियोजना की प्रमुख विशेषताएं:
लंबाई: 152.3 किलोमीटर
लागत: ₹8217.97 करोड़
अपेक्षित ट्रैफिक: 19.50 मिलियन टन प्रतिवर्ष
EIRR: 19.5%
FIRR: 5.51%
लाभान्वित जनसंख्या: 414 ग्राम पंचायतों एवं तीन नगरों के लगभग 10 लाख लोग
जुड़ाव: दिल्ली, लखनऊ, वाराणसी, प्रयागराज, अयोध्या, कोलकाता जैसे प्रमुख शहरों से सीधा जुड़ाव
रेलवे बोर्ड द्वारा अंबिकापुर-रेणुकूट, विंढमगंज, गढ़वा रोड, बरवाडीह, पत्थलगांव-सरडेगा व कोरबा तक फाइनल लोकेशन सर्वे स्वीकृत किया जा चुका है, जिसमें रेणुकूट और बरवाडीह के लिए DPR रेलवे बोर्ड में जमा हो चुकी है। रेणुकूट मार्ग की तकनीकी योग्यता, ट्रैफिक अनुमान और सामाजिक लाभ को देखते हुए इसे सर्वाधिक व्यावहारिक और लाभकारी माना गया है।
यह रेल मार्ग धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण होगा। जगन्नाथ पुरी से अयोध्या होते हुए यह राम वनगमन कॉरिडोर को एक नया आयाम देगा, जिससे श्रद्धालुओं और पर्यटकों को नई सुविधा मिलेगी। वाराणसी और प्रयागराज जैसी सांस्कृतिक नगरी तक सीधी पहुंच उत्तर छत्तीसगढ़ के लिए शिक्षा, संस्कृति और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी अवसर बढ़ाएगी।
रेल परियोजना से जुड़े क्षेत्र में कोयला (7200 मिलियन टन), बॉक्साइट और अन्य खनिज संसाधनों का विशाल भंडार मौजूद है। इस रेल लाइन से इन संसाधनों का परिवहन सुगम और लागत प्रभावी होगा। साथ ही यह कृषि उत्पादों, उर्वरक, वनोपज और व्यावसायिक फसलों की आवाजाही में भी सहायक सिद्ध होगा।
वर्तमान में इस रूट पर प्रतिदिन 15,000 लोग सड़क मार्ग से आवाजाही करते हैं। रेलवे कनेक्टिविटी से न केवल समय और दूरी घटेगी, बल्कि हजारों लोगों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रोजगार भी मिलेगा।
जहां अंबिकापुर–रेणुकूट मार्ग को हर मानक पर व्यावहारिक व लाभकारी पाया गया है, वहीं बरवाडीह मार्ग को दशकों से अलाभकारी और अव्यवहारिक घोषित किया जाता रहा है।
बरवाडीह मार्ग को 1960 से कभी पंचवर्षीय योजना में शामिल नहीं किया गया।
इस रूट पर पर्यावरण स्वीकृति बड़ी बाधा है, क्योंकि यह सेमरसोत अभ्यारण्य, बेतला नेशनल पार्क और टाइगर रिजर्व से होकर गुजरता है।
सुरक्षा के लिहाज से भी यह मार्ग असुरक्षित है; नक्सल गतिविधियों, ट्रैक ब्लास्टिंग, ट्रेन डकैती व लूट की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं।
रेलवे की प्रोजेक्ट इवोल्यूशन कमेटी भी इस क्षेत्र के लिए एक ही रेल कॉरिडोर को पर्याप्त मानती है, जिसमें रेणुकूट मार्ग सभी पैमानों पर बेहतर साबित हुआ है।
जब तकनीकी, सामाजिक, पर्यावरणीय व आर्थिक सभी पैमानों पर अंबिकापुर–रेणुकूट रेल लाइन उपयुक्त पाई गई है, तो इसे वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट में शामिल कर धरातल पर उतारने में और देरी क्यों? सर्वे रिपोर्ट, रेल मंत्रालय की स्वीकृति और व्यापक जनसमर्थन के बाद भी परियोजना को अटकाए रखना सवाल खड़े करता है।
जनहित में ठोस पहल की आवश्यकता
रेलवे के जोनल सलाहकार समिति के सदस्य मुकेश तिवारी ने कहा कि अब वक्त है कि अंबिकापुर रेणुकूट रेल परियोजना को लेकर राज्य और केंद्र सरकार ठोस निर्णय लें। यह केवल एक रेल लाइन नहीं, बल्कि सरगुजा अंचल के लाखों लोगों के जीवन, भविष्य और विकास से जुड़ा सपना है। इसे किसी वैकल्पिक सर्वे के बहाने फिर से लंबित रखना क्षेत्र की आकांक्षाओं का अपमान होगा। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ राज्य के रजत जयंती वर्ष में इस ऐतिहासिक परियोजना को शुरू कर उत्तर छत्तीसगढ़ को उसका बहुप्रतीक्षित ‘रेल अधिकार’ देना अब समय की मांग है।
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