Sudarshan Reddy VP 2025: उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बी. सुदर्शन रेड्डी को लेकर बस्तर के आदिवासियों में रोष, समर्थन न देने की सांसदों से अपील

Sudarshan Reddy VP 2025:  उपराष्ट्रपति चुनाव 2025 में INDIA गठबंधन के उम्मीदवार बी. सुदर्शन रेड्डी की उम्मीदवारी पर अब विवाद गहराता जा रहा है। छत्तीसगढ़ के नक्सल पीड़ित आदिवासी समुदाय ने खुले तौर पर इसका विरोध किया है। बस्तर शांति समिति के बैनर तले आदिवासियों ने मीडिया के सामने आकर कहा कि रेड्डी का अतीत, खासकर सलवा जुडूम आंदोलन पर प्रतिबंध लगाने का फैसला, बस्तर की शांति प्रक्रिया के लिए घातक साबित हुआ।

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सांसदों को पत्र, जनता से अपील

बस्तर के विभिन्न क्षेत्रों से आए पीड़ितों ने देशभर के सांसदों को पत्र लिखकर सुदर्शन रेड्डी को वोट न देने की अपील की है। साथ ही आम जनता से भी इस विरोध में नैतिक समर्थन देने का अनुरोध किया गया है। आदिवासियों का कहना है कि यह सिर्फ राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि उनकी सुरक्षा, जीवन और भविष्य से जुड़ा सवाल है।

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“सलवा जुडूम प्रतिबंध से माओवाद को बढ़ावा”

आंदोलनकारियों ने कहा कि बी. सुदर्शन रेड्डी ने न्यायपालिका में रहते हुए सलवा जुडूम आंदोलन पर प्रतिबंध लगाने में अहम भूमिका निभाई थी। आदिवासियों के मुताबिक, इस फैसले ने बस्तर में माओवादी गतिविधियों को फिर से सिर उठाने का मौका दिया। सियाराम रामटेके, जो एक नक्सली हमले में घायल होकर दिव्यांग हो चुके हैं, ने भावुक होते हुए कहा:”अगर सलवा जुडूम नहीं बंद होता, तो आज मैं अपने पैरों पर खड़ा होता।”वहीं, केदारनाथ कश्यप ने बताया कि आंदोलन बंद होने के बाद नक्सलियों ने उनके भाई की हत्या कर दी।

पीड़ितों की दास्तां: “बेटी सिर्फ तीन महीने की थी…”

मोहन उइके की पत्नी ने बताया कि उनके पति माओवादी एम्बुश में मारे गए थे, जब उनकी बेटी महज तीन महीने की थी। वहीं, चितंगावरम हमले के पीड़ित महादेव दूधु ने बताया कि माओवादी हमले में उन्होंने अपना एक पैर गंवा दिया, जबकि 32 लोग मारे गए थे।

“देश के सांसद सोच-समझकर करें फैसला”

बस्तर शांति समिति के सदस्य जयराम और मंगऊ राम कावड़े ने कहा कि देश के सांसदों को ऐसा व्यक्ति चुनने से बचना चाहिए, जिसकी नीतियों ने कभी हजारों आदिवासी परिवारों को नक्सली हिंसा के सामने असहाय छोड़ दिया। उन्होंने कहा कि सुदर्शन रेड्डी की उपराष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी से घाव फिर हरे हो गए हैं।बी. सुदर्शन रेड्डी की उपराष्ट्रपति उम्मीदवारी न केवल राजनीतिक बल्कि सामाजिक और भावनात्मक मुद्दा बन चुकी है। बस्तर के आदिवासी समाज की पीड़ा और मांग को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। अब देखना है कि सांसद इस विरोध को कितना गंभीरता से लेते हैं।

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