Mental Health
Mental Health : आज के दौर में यदि आपकी सांसें अचानक बिना किसी शारीरिक श्रम के तेज हो जाती हैं, दिल की धड़कनें अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाती हैं, कंधे और गर्दन में जकड़न महसूस होने लगती है या फिर लगातार सिरदर्द बना रहता है, तो सावधान हो जाइए। यह किसी मौसमी या वायरल इन्फेक्शन के लक्षण नहीं, बल्कि ‘एंग्जाइटी’ (Anxiety) यानी अत्यधिक चिंता के स्पष्ट संकेत हैं। पुरानी कहावत है कि ‘चिंता चिता के समान होती है’, जो आज के संदर्भ में पूरी तरह सच साबित हो रही है।
यदि कोई व्यक्ति इसकी गिरफ्त में आ जाए, तो बिना किसी प्रत्यक्ष शारीरिक बीमारी के भी उसका पूरा शरीर अंदर से खोखला होने लगता है। वर्तमान समय में एंग्जाइटी लोगों के बीच एक मानसिक महामारी का रूप ले चुकी है। आधुनिक जीवन की भागदौड़ में इंसानों ने सफलता, सुख और सामाजिक प्रतिष्ठा के इतने ऊंचे और कड़े मापदंड बना लिए हैं कि उनके पूरा न होने पर मानसिक तनाव और घबराहट का स्तर खतरनाक रूप से बढ़ जाता है।
हेल्थ एक्सपर्ट्स और मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, चिंता मूल रूप से हमारे मन की एक जटिल अवस्था है, जिसे मन ही महसूस करता है और वही इसका सामना भी करता है। तकनीकी रूप से एंग्जाइटी एक ऐसी सुरक्षात्मक मानसिक स्थिति है, जिसमें व्यक्ति का मस्तिष्क किसी संभावित या काल्पनिक खतरे को भांप लेता है। यह खतरा बाहरी भी हो सकता है, जैसे किसी अप्रिय घटना या दुर्घटना का डर, या फिर आंतरिक भी हो सकता है, जहां इंसान अपनी खुद की क्षमताओं, असफलताओं या भविष्य को लेकर आशंकित और परेशान रहता है।
इस स्थिति में मन और शरीर दोनों एक बहुत बड़ी चुनौती का अनुभव करते हैं, जिससे पूरा तंत्र अचानक ‘हाई अलर्ट मोड’ में चला जाता है। इस मानसिक आपातकाल के कारण शरीर में एड्रेनालाईन और कोर्टिसोल जैसे स्ट्रेस (तनाव) हार्मोन्स का तेजी से स्राव होने लगता है, जो शरीर में विभिन्न प्रकार के दर्दनाक और असहज करने वाले शारीरिक लक्षणों को जन्म देते हैं।
जब दिमाग में चिंता और घबराहट का स्तर बढ़ता है, तो शरीर बाहरी रूप से कोई संकेत दे, उससे पहले ही व्यक्ति के हृदय और छाती के हिस्से में इसके तीव्र लक्षण दिखाई देने लगते हैं। दिल की धड़कनों का अचानक बहुत तेज हो जाना (पैलपिटेशन) और नाड़ी की गति बढ़ना एंग्जाइटी के सबसे शुरुआती और प्रमुख लक्षणों में से एक हैं। इसके साथ ही पीड़ित व्यक्ति को सीने में एक अजीब सी जकड़न, भारीपन या दबाव महसूस होने लगता है, जिससे कई बार उसे हार्ट अटैक का भ्रम भी हो जाता है।
इस स्थिति में फेफड़ों की कार्यप्रणाली प्रभावित होती है, जिससे सांसें बहुत तेज चलने लगती हैं या फिर मरीज को ऐसा महसूस होता है कि उसे पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल रही है। सांस की इस कमी या घुटन के अहसास के कारण दिमाग तक ऑक्सीजन का प्रवाह अस्थाई रूप से प्रभावित होता है, जिससे अचानक चक्कर आना, आंखों के आगे अंधेरा छाना और अत्यधिक शारीरिक कमजोरी या थकान का अनुभव होना बेहद आम बात है।
अत्यधिक चिंता और एंग्जाइटी का हमारे पाचन तंत्र यानी ‘गट हेल्थ’ पर भी बेहद सीधा और गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। जब कोई व्यक्ति तीव्र मानसिक तनाव या डर की स्थिति में होता है, तो उसका शरीर ‘लड़ो या भागो’ (Fight or Flight) की स्थिति के लिए खुद को तैयार करता है। इस प्रक्रिया में शरीर का अधिकांश रक्त प्रवाह पाचन तंत्र से हटकर हाथ-पैरों की मांसपेशियों की ओर डाइवर्ट हो जाता है, ताकि व्यक्ति खतरे से निपट सके।
इसके परिणामस्वरूप आंतों की सामान्य कार्यप्रणाली बहुत धीमी हो जाती है, जिससे जी मिचलाना, पेट फूलना, गैस, अपच और बार-बार शौचालय जाने की तीव्र इच्छा जैसी पेट की गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं। इसके साथ ही, लगातार बने रहने वाले डर के कारण शरीर को सुरक्षित रखने की कोशिश में हमारी मांसपेशियां हमेशा सिकुड़ी और अत्यधिक सतर्क रहती हैं। इस अनचाहे और लंबे खिंचाव के कारण मसल्स एक सख्त गुच्छे की तरह व्यवहार करने लगती हैं, जिससे गर्दन, पीठ, कंधों और कमर में असहनीय दर्द और पुरानी अकड़न की समस्या पैदा हो जाती है।
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