Ashadh month 2026 : सनातन धर्म के कैलेंडर में आषाढ़ माह का विशेष स्थान है। यह पवित्र महीना जगत के पालनहार भगवान विष्णु को समर्पित है, जो आज से शुरू होकर 29 जुलाई को गुरु पूर्णिमा तक चलेगा। आषाढ़ मास का आध्यात्मिक दृष्टिकोण से अत्यधिक महत्व है, क्योंकि इसी माह से चातुर्मास का शुभारंभ होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवशयनी एकादशी के पश्चात भगवान विष्णु चार महीनों के लिए योगनिद्रा में पाताल लोक चले जाते हैं। इस कालखंड में साधक सांसारिक मोह-माया से विरक्त होकर स्नान, दान, जप-तप और ईश्वर की साधना में लीन होते हैं। शास्त्रों का मत है कि इस दौरान नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करने से न केवल मानसिक शांति मिलती है, बल्कि घर में सुख-समृद्धि और आरोग्य का वास भी बना रहता है।

शुभ संस्कारों पर विराम और संयमित जीवन
आषाढ़ के साथ ही चातुर्मास की शुरुआत हो जाती है, जिसे शास्त्रों में ‘विष्णु शयन’ काल माना गया है। देवशयनी एकादशी के बाद से आगामी चार महीनों के लिए विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, नामकरण और भूमि पूजन जैसे सभी मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है। इस अवधि को आत्म-चिंतन और आत्म-शुद्धि का समय माना जाता है। इस दौरान तामसिक प्रवृत्तियों और शारीरिक आलस्य का त्याग करना अनिवार्य बताया गया है। जो व्यक्ति इस माह में ब्रह्म मुहूर्त में उठकर दिनचर्या का पालन करता है, वह न केवल अपनी सेहत में सुधार पाता है, बल्कि अपनी कुंडली में सूर्य के शुभ प्रभावों को भी सुदृढ़ करता है। इसके विपरीत, देर तक सोने से व्यक्ति के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है और वह नकारात्मक ऊर्जा का अनुभव करता है।

खान-पान में सावधानी: सेहत और सात्विकता का संतुलन
वर्षा ऋतु के आगमन के साथ ही आषाढ़ माह में खान-पान को लेकर भी कड़े नियम निर्धारित किए गए हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों और शास्त्रों का मानना है कि मानसून के मौसम में हरी पत्तेदार सब्जियों में बैक्टीरिया और कीड़े-मकौड़ों के पनपने का खतरा सबसे अधिक होता है, जिससे उदर संबंधी गंभीर बीमारियां हो सकती हैं। अतः इस दौरान साग-सब्जियों से परहेज करना ही बुद्धिमानी है। साथ ही, जठराग्नि मंद होने के कारण मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन और मसूर की दाल जैसे तामसिक पदार्थों का सेवन वर्जित माना गया है। तामसिक भोजन न केवल शारीरिक अशुद्धि बढ़ाता है, बल्कि यह मानसिक अस्थिरता और आलस्य का भी प्रमुख कारण बनता है। सात्विक आहार का सेवन ही इस मौसम में स्वास्थ्य सुरक्षा का एकमात्र आधार है।
जल संरक्षण और आर्थिक समृद्धि का संबंध
आषाढ़ का महीना वर्षा का समय होता है, जिसे प्रकृति का पुनर्जन्म माना जाता है। धार्मिक ग्रंथों में जल को ईश्वर का स्वरूप माना गया है, इसलिए इस दौरान जल की बर्बादी न करना एक अत्यंत महत्वपूर्ण नियम है। ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति जल का दुरुपयोग करता है, उसे जीवन में आर्थिक तंगी और दरिद्रता का सामना करना पड़ता है। अतः इस माह में जल संरक्षण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। संक्षेप में, आषाढ़ माह हमें अनुशासित जीवन जीने, प्रकृति का सम्मान करने और अपनी आत्मा को ईश्वर के प्रति समर्पित करने का अवसर प्रदान करता है। इन नियमों का पालन कर कोई भी व्यक्ति शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से स्वयं को समृद्ध बना सकता है।
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