Ram Mandir Trust: सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या स्थित राम मंदिर के प्रबंधन के लिए गठित श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पुनर्गठन की मांग वाली निर्मोही अखाड़ा की याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। अखाड़े ने केंद्र सरकार को मौजूदा ट्रस्ट की संरचना में बदलाव कर उसे सार्वजनिक ट्रस्ट के रूप में पुनर्गठित करने का निर्देश देने की मांग की थी। हालांकि, शीर्ष अदालत ने अखाड़े को उचित याचिका दायर करने की सलाह दी।
चढ़ावे से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान उठा मुद्दा
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल थे। सोमवार को पीठ अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी और धन के कथित गबन से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इसी दौरान निर्मोही अखाड़ा की ओर से ट्रस्ट के पुनर्गठन का मुद्दा उठाया गया। अदालत ने संबंधित मामलों में जांच को आगे बढ़ाने पर भी निर्देश जारी किए।
एसआईटी को जांच जल्द पूरी करने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने अदालत द्वारा नियुक्त विशेष जांच दल यानी एसआईटी को कथित चढ़ावा गबन मामले की जांच जल्द पूरी करने और उसे तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने का निर्देश दिया। इसी सुनवाई के दौरान निर्मोही अखाड़ा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुशील जैन ने ट्रस्ट की मौजूदा संरचना पर सवाल उठाए। उन्होंने अदालत के समक्ष अखाड़े की मांगों को विस्तार से रखने की कोशिश की।
अखाड़े ने 2019 के फैसले का दिया हवाला
निर्मोही अखाड़े के वरिष्ठ अधिवक्ता सुशील जैन ने दलील दी कि वर्तमान ट्रस्ट की संरचना और उसके कथित रूप से निजी ट्रस्ट के तौर पर संचालन को नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ द्वारा दिए गए ऐतिहासिक फैसले की भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता। अखाड़े ने कहा कि वह अदालत के उसी फैसले को पूरी तरह लागू कराने की मांग कर रहा है। हालांकि, दलीलें जारी रहने के दौरान अदालत ने इस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया।
कोर्ट ने कहा- उचित याचिका दायर कीजिए
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने लाइव स्ट्रीमिंग को लेकर टिप्पणी की। इसके बाद प्रधान न्यायाधीश ने निर्मोही अखाड़े की याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए कहा कि उचित याचिका दायर की जाए। इस तरह फिलहाल अखाड़े की ट्रस्ट के पुनर्गठन और मंदिर प्रशासन में भूमिका बढ़ाने से संबंधित मांगों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई नहीं हुई।
राम जन्मभूमि विवाद में प्रमुख पक्षकार रहा है अखाड़ा
निर्मोही अखाड़ा प्राचीन रामानंदी हिंदू संन्यासी परंपरा का एक प्रमुख अखाड़ा है। अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद में भी यह प्रमुख पक्षकारों में शामिल रहा है। अखाड़े ने विवादित स्थल के प्रबंधन और रामलला से जुड़े अधिकारों का दावा किया था। अब उसने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में अपनी भूमिका और पारदर्शिता बढ़ाने की मांग को लेकर शीर्ष अदालत का रुख किया था।
ट्रस्ट को सार्वजनिक संस्था बनाने की मांग
अखाड़े की याचिका में केंद्र सरकार से ट्रस्ट की योजना में संशोधन कर उसे सार्वजनिक ट्रस्ट के रूप में पुनर्गठित करने की मांग की गई थी। इसके साथ ही रामानंदी बैरागी संप्रदाय के संतों को ट्रस्ट के बोर्ड में संरचनात्मक रूप से शामिल करने और उन्हें निगरानी संबंधी अधिकार देने की मांग की गई। अखाड़े ने ट्रस्टियों की नियुक्ति को लेकर केंद्र सरकार के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश तय करने की मांग भी रखी थी।
धार्मिक परंपराओं के अनुसार पूजा की मांग
याचिका में मांग की गई थी कि राम मंदिर में होने वाले सभी धार्मिक अनुष्ठान, सेवा, भोग, पूजा और अन्य समारोह रामानंदी संप्रदाय की परंपराओं के अनुसार आयोजित किए जाएं। अखाड़े ने कहा कि विवादित स्थल के अधिग्रहण से पहले लंबे समय से चली आ रही धार्मिक परंपराओं और रीति-रिवाजों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। इसके अलावा मूल प्रतिमाओं से संबंधित कई मांगें भी याचिका में शामिल थीं।
मूल प्रतिमाओं को लेकर भी उठाई मांग
निर्मोही अखाड़े ने 5 जनवरी 1950 और 16 फरवरी 1982 से जुड़ी श्रीरामलला विराजमान की मूल प्रतिमाओं को गर्भगृह में पुनर्स्थापित करने की मांग की थी। याचिका में दावा किया गया कि ट्रस्ट को इन मूल प्रतिमाओं को बदलने या उनके स्थान पर दूसरी प्रतिमाएं स्थापित करने का कानूनी अधिकार नहीं है। वैकल्पिक रूप से अखाड़े ने इन प्रतिमाओं को अपने सुपुर्द करने की मांग की थी, ताकि उनकी उचित देखभाल की जा सके।
ट्रस्ट के वित्तीय लेनदेन की जांच की मांग
निर्मोही अखाड़े ने एक स्वतंत्र समिति गठित करने की मांग भी की थी। समिति को यह जांच करने का प्रस्ताव दिया गया था कि नवंबर 2019 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के निर्देशों को ट्रस्ट ने पूरी तरह और ईमानदारी से लागू किया है या नहीं। इसके अलावा ट्रस्ट बोर्ड के वित्तीय और संपत्ति संबंधी लेनदेन की जांच के लिए फोरेंसिक ऑडिटर नियुक्त करने की मांग भी की गई थी। अखाड़े ने खुद को पंचायती मठ बताते हुए कहा कि उसके निर्णय पंचायत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत लिए जाते हैं।
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