Ashok Ram Joins JDU : बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस को तगड़ा राजनीतिक झटका लगा है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और दलित समुदाय के प्रभावशाली चेहरे अशोक राम ने कांग्रेस छोड़कर जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) का दामन थाम लिया है। अशोक राम का यह फैसला बिहार की सियासत में खासा महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि वे राज्य में कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष और पूर्व विधायक रह चुके हैं।

पटना में हुए कार्यक्रम में थामी जेडीयू की सदस्यता
रविवार को पटना में आयोजित एक समारोह में अशोक राम ने जेडीयू की सदस्यता ग्रहण की। इस दौरान जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा, मंत्री विजय चौधरी, श्रवण कुमार, रत्नेश सदा और प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा मौजूद रहे। अशोक राम का पार्टी में स्वागत करते हुए जेडीयू नेताओं ने इसे दलित समाज के लिए मजबूत संदेश बताया।

नीतीश कुमार के काम से प्रभावित होकर लिया फैसला
जेडीयू में शामिल होने के बाद अशोक राम ने कहा कि वे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्य और उनके नेतृत्व से बेहद प्रभावित हैं। उन्होंने कहा, “आज का दिन मेरे राजनीतिक जीवन का एक नया और महत्वपूर्ण अध्याय है। बिहार को आज नीतीश कुमार जैसे अनुभवी और विकासशील नेता की जरूरत है। मेरा लक्ष्य 2025 में ‘फिर से नीतीश’ के संकल्प को साकार करना है।”
कांग्रेस में रहे कई अहम पदों पर
अशोक राम बिहार कांग्रेस के उन नेताओं में शुमार थे जो छह बार विधायक चुने गए। वे न सिर्फ कांग्रेस विधायक दल के नेता रह चुके हैं, बल्कि पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष और राज्य सरकार में मंत्री के रूप में भी कार्य कर चुके हैं। इसके अलावा वे कांग्रेस वर्किंग कमिटी (CWC) और केंद्रीय चुनाव समिति (CEC) के सदस्य भी रहे हैं। उनका नाम राज्य की राजनीति में दलित समुदाय के सबसे सशक्त प्रतिनिधियों में लिया जाता रहा है।
राजनीतिक विरासत भी रही मजबूत
अशोक राम की राजनीतिक पृष्ठभूमि भी मजबूत रही है। उनके पिता बालेश्वर राम 1952 से 1977 तक लगातार सात बार बिहार विधानसभा के सदस्य रहे और केंद्र में मंत्री भी बनाए गए। वह इंदिरा गांधी सरकार में राज्यमंत्री के रूप में कार्यरत रहे। इस राजनीतिक विरासत ने अशोक राम को भी बिहार की राजनीति में मजबूत आधार दिया।
अशोक राम का कांग्रेस छोड़कर जेडीयू में शामिल होना केवल एक दल-बदल नहीं, बल्कि बिहार की आगामी सियासी तस्वीर में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। कांग्रेस के लिए यह एक और झटका है, जबकि जेडीयू के लिए यह सामाजिक समीकरण मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है।










