Assam Election 2026
Assam Election 2026: असम की 126 विधानसभा सीटों पर होने वाले आगामी चुनाव को लेकर राज्य का सियासी तापमान बढ़ने लगा है। अप्रैल-मई 2026 में होने वाले इन चुनावों में वर्तमान सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) अपनी सत्ता बचाने की कोशिश करेगी, वहीं कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल के रूप में वापसी की राह देख रही है। हालांकि, असम गण परिषद और यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल जैसे क्षेत्रीय दलों की सक्रियता के बीच ‘ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट’ (AIUDF) किंगमेकर की भूमिका में नजर आ रही है। बदरुद्दीन अजमल के नेतृत्व वाली यह पार्टी राज्य की तीसरी सबसे बड़ी शक्ति है और इसका जनाधार लगातार विस्तार कर रहा है।
इस चुनाव में सबसे बड़ी चर्चा ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) और AIUDF के बीच संभावित गठबंधन को लेकर है। यदि असदुद्दीन ओवैसी और बदरुद्दीन अजमल हाथ मिलाते हैं, तो असम की करीब 34 फीसदी मुस्लिम आबादी में ध्रुवीकरण की लहर और तेज हो सकती है। मुंबई नगर निगम चुनावों में अपनी ताकत दिखा चुकी ओवैसी की पार्टी अब पूर्वोत्तर में अपनी पैठ जमाने को बेताब है। जानकारों का मानना है कि यदि यह गठबंधन धरातल पर उतरता है, तो अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में कांग्रेस और अन्य धर्मनिरपेक्ष दलों के लिए अपना वोट बैंक बचाना बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।
बदरुद्दीन अजमल का असली प्रभाव असम के बांग्लाभाषी मुस्लिम समुदाय के बीच है। अल्पसंख्यक बहुल जिलों में AIUDF का संगठन इतना मजबूत है कि कांग्रेस भी उनके वोट शेयर में सेंध लगाने में नाकाम रही है। अजमल अक्सर अपने बयानों के जरिए इस समुदाय को एकजुट करने में सफल रहते हैं। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा भी यह स्वीकार कर चुके हैं कि राज्य की कम से कम 22 सीटें ऐसी हैं जहां भाजपा की स्थिति कमजोर है क्योंकि वहां अल्पसंख्यक मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। परिसीमन के बाद इन सीटों के समीकरण बदले जरूर हैं, लेकिन मुस्लिम मतदाताओं की बढ़ती संख्या अजमल की राजनीतिक पूंजी बनी हुई है।
कभी असम में अल्पसंख्यकों का निर्विवाद नेतृत्व करने वाली कांग्रेस के लिए AIUDF अब सबसे बड़ी सिरदर्द बन चुकी है। 2006 में महज 10 सीटों से शुरुआत करने वाली AIUDF ने 2011 में 18 और 2021 में 16 सीटें जीतकर यह साबित कर दिया कि अल्पसंख्यक वोट बैंक अब कांग्रेस से छिटककर अजमल की तरफ शिफ्ट हो गया है। 2024 के लोकसभा चुनावों में ‘मोदी लहर’ के चलते अजमल की पार्टी भले ही खाता न खोल पाई हो, लेकिन विधानसभा चुनावों के मुद्दे स्थानीय होते हैं। पिछले गठबंधन टूटने के बाद अब कांग्रेस और AIUDF के बीच होने वाला ‘फ्रेंडली फाइट’ सीधा फायदा सत्ता पक्ष को पहुँचा सकता है।
126 सदस्यीय विधानसभा में सत्ता की चाबी 64 के जादुई आंकड़े में छिपी है। विपक्षी खेमे का मानना है कि परिसीमन से पहले मुस्लिम बहुल सीटों की संख्या 29 थी, जो अब घटकर 22 रह गई है। इन 22 सीटों पर ही असम की सत्ता का भविष्य तय होगा। बदरुद्दीन अजमल इन क्षेत्रों में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं और यदि वे ओवैसी के साथ मिलकर ध्रुवीकरण करने में सफल रहे, तो असम का चुनावी परिणाम सबको चौंका सकता है। लोकसभा और विधानसभा के समीकरणों में अंतर होने के कारण अजमल का असर इस बार और अधिक प्रभावी होने की उम्मीद जताई जा रही है।
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