Bandhavgarh
Bandhavgarh Elephants Return: मध्य प्रदेश का बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व इन दिनों एक ऐतिहासिक बदलाव का गवाह बन रहा है। जंगल की पगडंडियों पर हाथियों के गहरे पदचिह्न, झुकी हुई झाड़ियाँ और गूंजती चिंघाड़ें इस बात का प्रमाण हैं कि गजराज का परिवार यहाँ स्थायी रूप से बस चुका है। करीब 100 साल के लंबे इंतजार के बाद हाथियों की यह वापसी वन्यजीव प्रेमियों और विशेषज्ञों के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है। वन विभाग के अनुसार, हाथियों की यह आवाजाही अब अस्थायी प्रवास न होकर एक स्थायी निवास में बदल चुकी है, जिससे जंगल का पारिस्थितिक तंत्र फिर से जीवंत हो उठा है।
इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि 16वीं और 17वीं शताब्दी तक मध्य प्रदेश के घने जंगलों में हाथियों की भारी मौजूदगी थी। हालाँकि, समय के साथ अनियंत्रित शिकार, जंगलों की कटाई और मानव हस्तक्षेप के कारण इनकी आबादी तेजी से घटती गई। साल 1925 के आसपास स्थिति ऐसी हो गई कि राज्य के जंगलों से हाथियों का नामोनिशान मिट गया और उनकी संख्या शून्य पर पहुँच गई। आज एक सदी बाद बांधवगढ़ और संजय दुबरी टाइगर रिजर्व में हाथियों की उपस्थिति उस पुराने गौरव को फिर से स्थापित कर रही है।
हाथियों की वापसी का सिलसिला साल 2017 में शुरू हुआ, जब छत्तीसगढ़ की सीमाओं को पार कर 7 हाथियों का एक छोटा झुंड संजय दुबरी टाइगर रिजर्व पहुँचा। आमतौर पर ऐसे झुंड कुछ समय बाद लौट जाते हैं, लेकिन इन हाथियों को यहाँ का माहौल इतना रास आया कि वे यहीं रुक गए। इसके अगले ही साल 2018 में लगभग 40 हाथियों का एक विशाल झुंड बांधवगढ़ पहुँचा। वर्तमान में मध्य प्रदेश के जंगलों में कुल 97 जंगली हाथी मौजूद हैं, जिनमें से अकेले बांधवगढ़ में इनकी संख्या 50 के करीब है। अब इन्हें प्रवासी नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश का स्थायी सदस्य माना जा रहा है।
हाथियों के यहाँ रुकने की सबसे बड़ी वजह बांधवगढ़ का शांत और सुरक्षित माहौल है। यहाँ सालभर पानी की उपलब्धता, प्रचुर मात्रा में हरी घास और इंसानी दखल का कम होना हाथियों के लिए आदर्श स्थिति पैदा करता है। वन विभाग ने भी गजराज की सुरक्षा के लिए बुनियादी ढांचे में बड़े बदलाव किए हैं। सुरक्षा गार्डों और मजदूरों को सुरक्षित रखने के लिए कैंपों में सोलर फेंसिंग (सौर बाड़) लगाई गई है और आधुनिक तकनीक के जरिए हाथियों की हर हरकत पर पैनी नजर रखी जा रही है।
हाथियों की बढ़ती संख्या के साथ उनकी सुरक्षा और इंसानों के साथ टकराव को रोकना एक बड़ी चुनौती है। वन विभाग ने हाथियों की आवाजाही वाले क्षेत्रों में पेट्रोलिंग तेज कर दी है। लगभग 200 किलोमीटर लंबे कॉरिडोर में फैले 100 से अधिक गाँवों में विशेष जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। गाँवों के पास लटकती बिजली की लाइनें हाथियों के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं, जिन्हें ऊँचा करने के लिए बिजली कंपनियों को कड़े निर्देश जारी किए गए हैं। प्रशासन का लक्ष्य इंसान और हाथी, दोनों के बीच एक सुरक्षित सह-अस्तित्व सुनिश्चित करना है।
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