Bangladesh Violence
Bangladesh Violence: बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद से हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा का भयावह दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है। कट्टरपंथियों द्वारा चुन-चुनकर हिंदुओं की संपत्ति और उनके जीवन को निशाना बनाया जा रहा है। हाल ही में मशहूर बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने सोशल मीडिया पर एक दिल दहला देने वाला वीडियो साझा किया है, जिसमें चटगांव में उपद्रवियों द्वारा हिंदुओं के घरों को आग के हवाले करते हुए देखा जा सकता है। यह हिंसा न केवल संपत्तियों को राख कर रही है, बल्कि बेगुनाह बच्चों और युवाओं की जान भी ले रही है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंताएं बढ़ गई हैं।
मंगलवार को चटगांव के एक रिहायशी इलाके में कट्टरपंथियों ने भारी तबाही मचाई। पीड़ितों की पहचान जयंती संघ और बाबू शुकुशील के रूप में हुई है। जब हमलावरों ने घर में आग लगाई, उस वक्त पूरा परिवार भीतर ही मौजूद था। उपद्रवियों ने भागने के सारे रास्ते और दरवाजे बाहर से बंद कर दिए थे। चश्मदीदों के मुताबिक, लपटों के बीच घिरे परिवार ने मौत को सामने देखकर लोहे की बाड़ को काटा और वहां से जान बचाकर भागे। इस आगजनी में घर का सारा सामान खाक हो गया और परिवार के पालतू जानवर जिंदा जल गए। हालांकि प्रशासन ने पीड़ितों को 25 किलो चावल और कुछ नकद सहायता देने का वादा किया है, लेकिन इलाके में दहशत का माहौल बरकरार है।
हिंसा की सबसे क्रूर तस्वीर 19 दिसंबर की रात लक्ष्मीपुर सदर से सामने आई। यहां कुछ अज्ञात हमलावरों ने एक हिंदू परिवार के घर को बाहर से कुंडी लगाकर बंद कर दिया और फिर पेट्रोल डालकर आग लगा दी। सो रहे परिवार को संभलने का मौका तक नहीं मिला। इस भीषण अग्निकांड में 7 साल की एक मासूम बच्ची जिंदा जल गई, जिसकी मौके पर ही तड़प-तड़प कर मौत हो गई। परिवार के तीन अन्य सदस्य गंभीर रूप से झुलस गए हैं और अस्पताल में जीवन-मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं। पुलिस ने केस तो दर्ज किया है, लेकिन अब तक एक भी आरोपी की गिरफ्तारी नहीं होना प्रशासन की नीयत पर सवाल खड़े करता है।
18 दिसंबर को ढाका के पास भालुका इलाके में एक और हिंदू युवक, दीपू चंद्र, कट्टरपंथ की भेंट चढ़ गया। एक कपड़ा कारखाने में काम करने वाले दीपू पर ईशनिंदा का फर्जी आरोप लगाया गया। भीड़ ने दावा किया कि उसने फेसबुक पर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई है। इस आधार पर उसकी पीट-पीटकर हत्या कर दी गई और बाद में शव को जलाने की कोशिश की गई। बाद में पुलिस जांच में खुलासा हुआ कि दीपू के सोशल मीडिया पर ऐसी कोई टिप्पणी मौजूद ही नहीं थी। असल में, यह फैक्टरी में काम के विवाद को धार्मिक रंग देकर की गई एक सोची-समझी हत्या थी।
बांग्लादेश के विभिन्न हिस्सों, जैसे चटगांव और लक्ष्मीपुर में हुई इन घटनाओं ने वहां रह रहे अल्पसंख्यकों के मन में गहरा डर भर दिया है। हालांकि उपजिला कार्यकारी अधिकारी (UNO) और अन्य प्रशासनिक अधिकारी नुकसान का जायजा लेने पहुंच रहे हैं, लेकिन उनकी मदद महज खानापूर्ति नजर आती है। पीड़ित परिवारों का कहना है कि उन्हें चावल और कंबल नहीं, बल्कि सुरक्षा और न्याय चाहिए। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन लगातार बांग्लादेश की अंतरिम सरकार से हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील कर रहे हैं, लेकिन धरातल पर कट्टरपंथियों के हौसले बुलंद नजर आ रहे हैं।
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