Chhattisgarh Culture : खूबसूरत दिखने और श्रृंगार करने की परंपरा कोई नई नहीं है। आज बाजार में तरह-तरह के कॉस्मेटिक उत्पाद आसानी से उपलब्ध हैं, लेकिन कुछ दशक पहले महिलाओं और पुरुषों के श्रृंगार में इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक साधन अब लगभग इतिहास का हिस्सा बन चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय सौंदर्य दिवस के मौके पर भिलाई का एक अनोखा संग्रह इसी पुरानी परंपरा और शिल्पकला की याद दिलाता है।
एलसी कश्यप ने सहेजे 70 दुर्लभ श्रृंगार साधन
भिलाई के सेक्टर-7 निवासी एलसी कश्यप के पास प्राचीन और पारंपरिक सौंदर्य साधनों का अनोखा संग्रह है। उनके संग्रह में करीब 70 दुर्लभ नमूने मौजूद हैं। इनमें सिंदूरदान, काजलदान और सूरमेदान प्रमुख हैं। इनमें से कई वस्तुएं करीब 80 से 90 साल पुरानी बताई जाती हैं। ये पारंपरिक साधन पीतल, कांसे और अन्य धातुओं से तैयार किए गए हैं।
ढोकरा नक्काशी से सजाए गए हैं पुराने बर्तन
कश्यप के संग्रह की खासियत केवल इन वस्तुओं की उम्र नहीं, बल्कि इन पर की गई बारीक कारीगरी भी है। पारंपरिक श्रृंगार साधनों पर हाथी, मोर, मछली, फूल और जालीदार पत्तियों जैसी आकृतियां उकेरी गई हैं। इन डिजाइन में ढोकरा शिल्प की झलक दिखाई देती है। यही वजह है कि ये वस्तुएं सौंदर्य साधन होने के साथ-साथ पारंपरिक कला और संस्कृति की विरासत भी मानी जा सकती हैं।
काजलदान में लगा होता था छोटा आईना
पुराने समय में इस्तेमाल होने वाला काजलदान या काजलौटा भी संग्रह का महत्वपूर्ण हिस्सा है। करीब 80 से 100 वर्ष पुराने कुछ पीतल और कांसे के काजलदान में ढक्कन पर छोटा आईना लगा हुआ है। इनके पीछे कमर में टांगने के लिए कुंडा भी बनाया गया था। हाथी, मोर और फूलों की ढोकरा नक्काशी इन वस्तुओं को और आकर्षक बनाती है।
सिंदूरदान में दिखती है बारीक कलाकारी
सिंदूरदान भी इस संग्रह की खास वस्तुओं में शामिल है। पीतल और कांसे से बनी इन प्राचीन डिबियों पर कछुआ, फूल, देवी का चेहरा और पान के पत्तों जैसी आकृतियां उकेरी गई हैं। आधुनिक दौर में इस तरह की पारंपरिक डिबियां बाजार में आसानी से देखने को नहीं मिलतीं। इसलिए इनका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व और बढ़ जाता है।
पुरुषों के श्रृंगार का हिस्सा था सूरमेदान
संग्रह में मौजूद सूरमेदान पुराने समय में पुरुषों के श्रृंगार में इस्तेमाल किया जाता था। पीतल से बनी इन डिबियों के साथ सुरमा लगाने के लिए नक्काशीदार सलाई भी होती थी। कुछ सूरमेदान मछली के आकार में बनाए गए हैं। उस दौर में मछली की आकृति को शुभ माना जाता था और इसे बुरी नजर से बचाने से भी जोड़ा जाता था।
आधुनिक कॉस्मेटिक युग में खो गई पुरानी पहचान
आज काजल, सिंदूर और अन्य सौंदर्य उत्पाद आधुनिक पैकेजिंग में बाजार में उपलब्ध हैं। इसके विपरीत पुराने समय के धातु से बने श्रृंगार साधनों का इस्तेमाल लगभग समाप्त हो गया है। कश्यप का संग्रह इन वस्तुओं को संरक्षित करने के साथ-साथ नई पीढ़ी को पुराने समय की जीवनशैली, श्रृंगार परंपरा और भारतीय हस्तशिल्प से परिचित कराने का काम कर रहा है।
संग्रह को मिल चुका है रिकॉर्ड में स्थान
एलसी कश्यप के इस अनोखे संग्रह को वर्ष 2021 में गोल्डन बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी दर्ज किया गया था। यह उपलब्धि बताती है कि पारंपरिक सौंदर्य साधनों को सहेजने का उनका प्रयास कितना खास है। संग्रह के माध्यम से पुरानी वस्तुओं को केवल प्रदर्शित ही नहीं किया जा रहा, बल्कि उनसे जुड़ी संस्कृति और उपयोग की जानकारी भी लोगों तक पहुंच रही है।
15 साल की मेहनत से तैयार हुआ अनोखा संग्रह
कश्यप के मुताबिक इस संग्रह को तैयार करने में करीब 12 से 15 वर्ष का समय लगा। उन्होंने छत्तीसगढ़ के अलावा राजस्थान और मध्यप्रदेश के हाट-बाजारों तथा पुराने घरों से इन वस्तुओं को जुटाया। कई दुर्लभ वस्तुओं को तलाशने और सुरक्षित रखने में काफी मेहनत करनी पड़ी। उनके अनुसार पुराने समय में काजलदान महिलाओं और सूरमेदान पुरुषों के श्रृंगार का हिस्सा हुआ करते थे।
पुरानी वस्तुएं नई पीढ़ी के लिए बनीं विरासत
कश्यप का संग्रह आज सिर्फ धातु से बनी पुरानी डिबियों और श्रृंगार साधनों का समूह नहीं है, बल्कि यह बीते दौर की सामाजिक और सांस्कृतिक जीवनशैली की झलक भी प्रस्तुत करता है। आधुनिक तकनीक और कॉस्मेटिक उत्पादों के बीच ऐसी वस्तुएं लोगों को अपनी जड़ों और पारंपरिक शिल्प से जोड़ती हैं। यही वजह है कि भिलाई का यह संग्रह पुरानी विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण प्रयास माना जा सकता है।
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