Bhopal Drug Alert
Bhopal Drug Alert: मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने चिकित्सा जगत और अभिभावकों की नींद उड़ा दी है। नशा केवल शराब, सिगरेट या ड्रग्स का नहीं होता, बल्कि अब एक ऐसा खतरनाक चलन बढ़ा है जिसमें युवा अपने ही रक्त का इस्तेमाल नशे के तौर पर कर रहे हैं। इसे ‘ब्लड किक’ कहा जा रहा है। विदेशों से शुरू हुआ यह भयावह ट्रेंड अब भोपाल की गलियों और घरों तक पहुंच चुका है, जहां युवा एक क्षणिक सुकून के चक्कर में मौत के साथ खेल रहे हैं।
भोपाल का प्रसिद्ध हमीदिया अस्पताल इन दिनों एक अजीबोगरीब चुनौती का सामना कर रहा है। यहां के मनोरोग विभाग में पिछले कुछ समय से ऐसे युवा आ रहे हैं जिनकी समस्या नशे के पारंपरिक पदार्थों से अलग है। डॉक्टरों ने पाया कि ये युवा अपनी नसों से सिरिंज के जरिए खून निकालते हैं और फिर उसी खून को वापस अपने शरीर में इंजेक्ट कर लेते हैं। उन्हें भ्रम है कि ऐसा करने से उन्हें तुरंत ऊर्जा महसूस होती है और एक अलग तरह का मानसिक सुकून मिलता है। यह प्रक्रिया जितनी डरावनी है, उतनी ही जटिल भी।
मनोचिकित्सक डॉ. जेपी अग्रवाल के अनुसार, मेडिकल भाषा में इसे ‘ऑटोहेमोथेरेपी एब्यूज’ कहा जाता है, लेकिन सामान्य तौर पर यह एक ‘बिहेवियरल एडिक्शन’ है। इसमें व्यक्ति का दिमाग इस अजीब क्रिया को एक इनाम (Reward) के रूप में देखने लगता है। यह नशा खून का नहीं, बल्कि उस दर्द और उसके बाद मिलने वाली कथित राहत का होता है। युवाओं को लगता है कि उनके अपने ही खून का दोबारा संचार उन्हें ‘यूफोरिया’ या अत्यंत आनंद की स्थिति में ले जाता है, जबकि विज्ञान के अनुसार इसका कोई भी सकारात्मक प्रभाव नहीं है।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इस लत के पीछे सोशल मीडिया का बहुत बड़ा हाथ है। इंटरनेट पर मौजूद कुछ डार्क कम्युनिटीज और खतरनाक चुनौतियों वाले वीडियो देखकर युवा इसे ‘कूल’ या ‘एडवेंचरस’ समझने लगते हैं। शुरुआत केवल एक बार आजमाने की जिज्ञासा से होती है, लेकिन धीरे-धीरे दिमाग इस प्रक्रिया का आदी हो जाता है। जब तक परिवार या दोस्तों को इसकी भनक लगती है, तब तक युवा इस दलदल में काफी अंदर तक धंस चुका होता है।
डॉ. अग्रवाल ने ‘ब्लड किक’ के शारीरिक दुष्प्रभावों को लेकर कड़ी चेतावनी दी है। बार-बार असुरक्षित तरीके से खून निकालने और चढ़ाने से शरीर का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ जाता है। इससे सेप्सिस (खून का जहर), गंभीर संक्रमण, एचआईवी (HIV), हेपेटाइटिस, नसों का फटना, और खून के थक्के (Blood Clots) बनने का खतरा रहता है। लगातार इस प्रक्रिया को दोहराने से बोन मैरो पर दबाव पड़ता है और शरीर के महत्वपूर्ण अंग काम करना बंद कर सकते हैं। यह लत किसी भी समय अचानक मौत का कारण बन सकती है।
चिकित्सकों का मानना है कि ‘ब्लड किक’ केवल एक नशा नहीं, बल्कि एक गहरे मानसिक विकार का संकेत है। इसके पीछे अक्सर डिप्रेशन, खुद को नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति (Self-harm) या दूसरों का ध्यान खींचने की इच्छा (Attention Seeking) छिपी होती है। जो युवा समाज या परिवार में खुद को अकेला महसूस करते हैं, वे अक्सर ऐसे आत्मघाती रास्तों को चुन लेते हैं। यह एक ऐसी बीमारी है जिसमें व्यक्ति खुद को दर्द देकर सुकून तलाशने की नाकाम कोशिश करता है।
डॉक्टरों का कहना है कि जिस खून से जिंदगी चलती है, उसी का नशा करना क्लिनिकल डेथ को दावत देना है। इसका इलाज केवल दवाओं से संभव नहीं है। इसके लिए सघन काउंसलिंग, बिहेवियरल थेरेपी और परिवार के सहयोग की आवश्यकता होती है। माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों के व्यवहार पर नजर रखें और यदि वे गुमसुम रहते हैं या उनके शरीर पर सुई के निशान दिखते हैं, तो तुरंत विशेषज्ञ से सलाह लें। याद रखें, ‘ब्लड किक’ का इलाज अस्पताल की बेड पर नहीं, बल्कि सही संवाद और सही समय पर मिली मदद में है।
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