Bhupesh Baghel
Bhupesh Baghel: छत्तीसगढ़ की राजनीति में महिला आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस विषय पर केंद्र और राज्य की भाजपा सरकार को आड़े हाथों लिया है। बघेल ने न केवल भाजपा की नीयत पर सवाल उठाए, बल्कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को एक व्यक्तिगत और राजनीतिक तंज के साथ चुनौती भी दे डाली। दूसरी ओर, भाजपा ने इस मुद्दे पर विपक्ष के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और राज्य विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की तैयारी तेज कर दी है।
अपने निवास पर आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान भूपेश बघेल ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय पर सीधा निशाना साधा। उन्होंने कहा, “विष्णु जी, अगर आपको महिला सशक्तिकरण की इतनी ही चिंता है, तो कौशल्या भाभी (मुख्यमंत्री की पत्नी) को मुख्यमंत्री बना दीजिए।” बघेल ने आरोप लगाया कि आरएसएस, जनसंघ और भाजपा की विचारधारा ने कभी भी महिलाओं को शीर्ष नेतृत्व में वास्तविक अवसर नहीं दिए। उन्होंने भाजपा की ‘आक्रोश रैली’ को केवल एक राजनीतिक दिखावा करार दिया।
बघेल ने महिला आरक्षण के इतिहास को खंगालते हुए दावा किया कि इसकी सबसे पहली गंभीर कोशिश पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने की थी। उन्होंने कहा कि यदि भाजपा ने 1989 में अड़ंगा नहीं लगाया होता, तो महिला आरक्षण कानून दशकों पहले ही लागू हो चुका होता। बघेल ने आरोप लगाया कि भाजपा ने हमेशा से प्रगतिशील कानूनों के रास्ते में बाधाएं उत्पन्न की हैं और आज वे केवल श्रेय लेने की राजनीति कर रहे हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री ने पंचायती राज व्यवस्था का जिक्र करते हुए कहा कि कांग्रेस शासन के दौरान ही महिलाओं को स्थानीय निकायों में आरक्षण दिया गया। मध्य प्रदेश (तत्कालीन अविभाजित) में इसे लागू करने के बाद 1995 में पहले चुनाव हुए, जिससे लाखों महिलाएं मुख्यधारा की राजनीति में शामिल हुईं। बघेल के अनुसार, आज जो भी महिला नेतृत्व हम देख रहे हैं, वह कांग्रेस की दूरदर्शिता का परिणाम है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कांग्रेस हमेशा से ही संसद और विधानसभाओं में भी महिलाओं के लिए आरक्षण की प्रबल समर्थक रही है।
दूसरी ओर, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने महिला आरक्षण बिल के मुद्दे पर विपक्ष को घेरने की पूरी योजना बना ली है। हाल ही में भाजपा द्वारा निकाली गई ‘आक्रोश रैली’ के बाद अब साय सरकार इसी महीने विधानसभा का एक दिवसीय विशेष सत्र बुलाने की तैयारी में है। मुख्यमंत्री साय का कहना है कि विपक्ष ने जिस तरह से इस महत्वपूर्ण बिल को लेकर रुख अपनाया है, उसके खिलाफ सदन में एक ‘निंदा प्रस्ताव’ लाया जाएगा।
विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने के लिए एक निश्चित संवैधानिक प्रक्रिया का पालन किया जाता है। सबसे पहले मुख्यमंत्री और उनकी कैबिनेट सत्र आयोजित करने का औपचारिक निर्णय लेते हैं। इसके बाद, इस प्रस्ताव को मंजूरी के लिए राज्यपाल के पास भेजा जाता है। राज्यपाल की स्वीकृति मिलने के बाद ही आधिकारिक तौर पर सत्र की तिथि अधिसूचित की जाती है। माना जा रहा है कि इस सत्र के दौरान महिला आरक्षण के मुद्दे पर छत्तीसगढ़ विधानसभा में भारी हंगामा और तीखी बहस देखने को मिल सकती है।
छत्तीसगढ़ में महिला आरक्षण का मुद्दा अब केवल सामाजिक सुधार का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह एक प्रमुख चुनावी हथियार बन चुका है। एक तरफ भूपेश बघेल कांग्रेस के ऐतिहासिक योगदान को गिना रहे हैं, तो दूसरी तरफ भाजपा सरकार विशेष सत्र के माध्यम से विपक्ष को ‘महिला विरोधी’ साबित करने की कोशिश में है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि राज्य की आधी आबादी इन राजनीतिक दांव-पेचों को किस नजरिए से देखती है।
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