राजनीति

Bihar Election 2025: नीतीश के ‘खास’ विधायक गोपाल मंडल का धरना, सीट बंटवारे से नाराजगी

Bihar Election 2025:  बिहार में एनडीए गठबंधन में सीट बंटवारे के बाद अब अंदरूनी नाराजगी सतह पर आने लगी है। इसी कड़ी में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के करीबी माने जाने वाले जदयू विधायक गोपाल मंडल ने सोमवार सुबह पटना स्थित सीएम आवास के बाहर धरना दे दिया। भागलपुर जिले के गोपालपुर से विधायक गोपाल मंडल ने साफ कहा कि जब तक उन्हें विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी का टिकट नहीं मिलेगा, वे वहां से नहीं हटेंगे।

सुबह करीब साढ़े 8 बजे से सीएम आवास के बाहर मौजूद गोपाल मंडल ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “मैं जब तक टिकट नहीं ले लूंगा, यहां से नहीं जाने वाला हूं। मैं कद्दावर नेता हूं, मुझे टिकट मिलेगा ही।” उन्होंने भरोसे के साथ दावा किया कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिलकर ही वहां से रवाना होंगे और पार्टी का सिंबल भी लेकर ही जाएंगे।

पार्टी से नाराजगी और बयानबाजी का असर

पिछले कुछ समय से गोपाल मंडल पार्टी की नीतियों को लेकर खुलेआम नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। खासतौर से उन्होंने यह आरोप लगाया था कि “पार्टी की नीतियों के कारण अति पिछड़ा वर्ग के नेताओं को आगे बढ़ने का मौका नहीं मिल रहा।” माना जा रहा है कि इस तरह के बयानों से जदयू नेतृत्व नाराज है और यही कारण है कि पार्टी उनकी सीट से किसी नए चेहरे को टिकट देने पर विचार कर रही है।

गोपाल मंडल का दावा: “मुझे टिकट मिलेगा ही”

धरना स्थल से गोपाल मंडल ने आत्मविश्वास के साथ कहा, “मैंने हमेशा पार्टी के लिए काम किया है। जनता मेरे साथ है। मुझे टिकट नहीं मिला तो पार्टी को नुकसान होगा। न्यूज जब अंदर तक पहुंचेगा तब सीएम बुलाएंगे, और मैं अंदर जाऊंगा। टिकट लेकर ही वापस लौटूंगा।”

नीतीश कुमार के लिए चुनौती

गोपाल मंडल जदयू के पुराने और चर्चित चेहरों में से एक हैं। हालांकि उनके कई विवादित बयान और बड़बोलेपन के कारण पार्टी को अक्सर असहज स्थिति का सामना करना पड़ा है। ऐसे में पार्टी उनके टिकट को लेकर रणनीतिक पुनर्विचार कर रही है, लेकिन उनका धरना यह दिखाता है कि असंतोष धीरे-धीरे उभरकर सामने आने लगा है।

बिहार चुनाव की तैयारियों के बीच गोपाल मंडल जैसे पुराने और प्रभावशाली विधायकों की नाराजगी से जदयू नेतृत्व के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। अगर ऐसे नेताओं को साधा नहीं गया, तो एनडीए गठबंधन के भीतर मतभेद और गहरा सकते हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस स्थिति से कैसे निपटते हैं—क्या वे अपने ‘खास’ विधायक को मना पाएंगे या इस बार संगठन के फैसले को प्राथमिकता देंगे?

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