Bihar elections 2025: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में जहां एक ओर जनता विकास, रोजगार, जाति और धर्म जैसे पारंपरिक मुद्दों पर चर्चा की उम्मीद कर रही थी, वहीं इस बार राजनीतिक संग्राम पूरी तरह वोट चोरी के मुद्दे पर केंद्रित हो गया है। महागठबंधन और एनडीए के बीच वोटर लिस्ट में धांधली, दो EPIC नंबर और फर्जी वोटिंग को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज़ हो गया है।

तेजस्वी यादव से शुरू हुआ विवाद
राजद नेता तेजस्वी यादव ने इस बहस की शुरुआत तब की जब उन्होंने आरोप लगाया कि उनका नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया है। उन्होंने इसे बीजेपी और चुनाव आयोग की साजिश करार दिया। हालांकि, चुनाव आयोग ने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए बताया कि तेजस्वी का नाम हटाया नहीं गया बल्कि उनका मतदान केंद्र बदला गया है – अब वह बूथ संख्या 204 पर वोट डालेंगे, पहले वह 171 पर थे।

इसी के साथ चुनाव आयोग ने तेजस्वी यादव पर दो वोटर आईडी रखने का गंभीर आरोप लगाया। आयोग के अनुसार, तेजस्वी दीघा सीट के वोटर हैं लेकिन विधायक राघोपुर से हैं, जिससे उनकी दो EPIC IDs का सवाल खड़ा हो गया। एनडीए नेताओं ने इस मुद्दे पर कार्रवाई की मांग की।
NDA नेताओं पर पलटवार
तेजस्वी यादव ने चुनाव आयोग के आरोप को हथियार बनाते हुए एनडीए नेताओं पर भी निशाना साधना शुरू कर दिया। सबसे पहले उन्होंने डिप्टी सीएम विजय सिन्हा पर दो वोटर कार्ड रखने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि विजय सिन्हा लखीसराय और बांकीपुर दोनों के वोटर हैं और दोनों जगह अलग-अलग उम्र दर्ज है – एक में 60, दूसरे में 57।
इसके बाद उन्होंने मुजफ्फरपुर की मेयर निर्मला देवी और उनके परिजनों पर भी दो-दो EPIC नंबर रखने और उम्र में अंतर जैसे आरोप लगाए। इसी कड़ी में सबसे ताजा नाम NDA सांसद वीणा देवी का है, जिनके पास दो अलग-अलग लोकसभा क्षेत्रों में वोट दर्ज होने का दावा किया गया है।
कांग्रेस का देशव्यापी हमला
यह लड़ाई सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं रही। राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया है। राहुल गांधी ने कर्नाटक और केरल के मामलों को उजागर किया जहां कथित तौर पर फर्जी वोट मिले हैं। केरल की त्रिशूर सीट, जहां बीजेपी ने जीत दर्ज की, वहां एक ही घर से 9 फर्जी वोट मिलने का दावा किया गया है।
क्या जनता देगी मुद्दे को समर्थन?
वोट चोरी का यह मुद्दा जितना बड़ा दिख रहा है, उतनी ही चुनौतीपूर्ण है इसकी सच्चाई को जनता तक पहुँचाना। महागठबंधन इस मुद्दे को चुनाव तक ज़िंदा रखना चाहता है। लेकिन अंततः फैसला जनता के हाथ में है। अगर बिहार की जनता इस मुद्दे को चुनावी एजेंडा मानकर महागठबंधन को समर्थन देती है, तो इसका असर राष्ट्रीय राजनीति में भी देखने को मिल सकता है।










