Bilaspur Ayushman Scam
Bilaspur Ayushman Scam: गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को गंभीर और महंगी बीमारियों के इलाज के खर्च से मुक्ति दिलाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई महत्वाकांक्षी ‘आयुष्मान भारत योजना’ बिलासपुर में दम तोड़ती नजर आ रही है। बिलासपुर के नामी निजी अस्पतालों की मनमानी, लालच और प्रशासनिक अधिकारियों की घोर लापरवाही के कारण यह जनकल्याणकारी योजना केवल कागजों तक ही सीमित रह गई है। योजना के तहत अनुबंधित शहर के बड़े-बड़े निजी अस्पतालों ने अपनी बिल्डिंग के बाहर तो बड़े-बड़े होर्डिंग्स और बैनर टांग रखे हैं कि ‘यहाँ आयुष्मान कार्ड से मुफ्त इलाज होता है’, लेकिन जैसे ही कोई गरीब मरीज अस्पताल के भीतर कदम रखता है, उसे और उसके परिजनों को एक सोचे-समझे मकड़जाल में फंसा दिया जाता है।
सरकारी नियमों और स्वास्थ्य विभाग के मापदंडों के मुताबिक, आयुष्मान योजना से जुड़े सभी निजी अस्पतालों के लिए यह अनिवार्य किया गया है कि वे अपने मुख्य द्वार, स्वागत कक्ष या कैश काउंटर पर उन सभी गंभीर बीमारियों, डॉक्टरों के नाम और सरकारी पैकेजों की सूची हिंदी में स्पष्ट रूप से चस्पा (Disclose) करें, जिनका इलाज उनके यहाँ उपलब्ध है। लेकिन बिलासपुर शहर के अधिकांश अस्पतालों ने इस बेहद जरूरी नियम को पूरी तरह से ठंडे बस्ते में डाल दिया है। इसके परिणामस्वरूप, सुदूर ग्रामीण इलाकों और कस्बों से कर्ज लेकर आए गरीब मरीज अपने तीमारदारों के साथ अस्पताल के एक काउंटर से दूसरे काउंटर तक सिर्फ यह पूछने के लिए भटकते रहते हैं कि क्या उनकी बीमारी का इलाज इस कार्ड से हो पाएगा या नहीं।
जब मीडिया की विशेष टीम ने बिलासपुर शहर के कई चयनित निजी अस्पतालों में जाकर धरातलीय स्थिति का जायजा लिया, तो बेहद चौंकाने वाले और शर्मनाक मामले सामने आए। अस्पतालों में सरकार द्वारा तैनात किए गए ‘आयुष्मान मित्र’ अपनी मुख्य डेस्क पर तो बैठे हुए मिले, लेकिन वे मरीजों की सहायता करने के बजाय अपने मोबाइल फोन में व्यस्त दिखाई दिए। इलाज के लिए तड़प रहे गरीब मरीजों और उनके परिजनों के साथ इन आयुष्मान मित्रों का व्यवहार बेहद असंवेदनशील और रूखा पाया गया। जब मरीज उनसे किसी विशेष बीमारी के इलाज और उपलब्ध पैकेज के बारे में पूछते हैं, तो वे सही जानकारी देने की जहमत तक नहीं उठाते। किसी भी अस्पताल में ऐसा कोई सूचना बोर्ड नहीं मिला जिससे मरीजों को पारदर्शी जानकारी मिल सके।
तिफरा के रहने वाले रामखिलावन अपने वृद्ध पिता को दिल की गंभीर बीमारी के इलाज के लिए एक बड़े निजी अस्पताल में लेकर पहुंचे थे। अस्पताल के बाहर आयुष्मान योजना का बड़ा बोर्ड देखकर वे इस उम्मीद में अंदर गए कि उनके पिता का मुफ्त इलाज हो जाएगा। लेकिन पूरे दो घंटे तक एक काउंटर से दूसरे काउंटर तक भटकने और गुहार लगाने के बाद, आयुष्मान मित्र ने बेहद गैर-जिम्मेदाराना लहजे में कह दिया, “हमारे यहाँ कार्ड से हार्ट (दिल) का इलाज अभी बंद है, आप मरीज को कहीं और ले जाइए।”
शहर के अधिकांश अस्पतालों में एक और कड़वी हकीकत देखने को मिली। यहाँ ‘आयुष्मान हेल्प डेस्क’ को जानबूझकर अस्पताल के ऐसे सुनसान और अंधेरे कोनों में बनाया गया है, जहाँ आम मरीजों की नजर आसानी से न पड़े। इलाज और पैकेजों की सूची चस्पा न होने का सबसे बड़ा नुकसान यह हो रहा है कि अस्पताल प्रबंधन ऐन वक्त पर, जब मरीज की हालत बेहद नाजुक होती है, यह बहाना बना देता है कि इस बीमारी का सरकारी पैकेज ब्लॉक है या समाप्त हो चुका है। ऐसे में मरीज को बचाने के लिए परिजन मजबूरी में निजी वार्ड और महंगे इलाज के लिए नकद पैसे देने को तैयार हो जाते हैं।
निजी अस्पतालों द्वारा इलाज की सूची को सार्वजनिक न करने के पीछे एक बहुत बड़ा व्यावसायिक और सोचा-समझा गणित काम कर रहा है, जिसे इस प्रकार समझा जा सकता है:
मुनाफे वाले मरीजों का चयन: बीमारियों की सूची न होने से अस्पताल प्रबंधन यह खुद तय करता है कि उसे किस मरीज को भर्ती करना है और किसे वापस भेजना है। जिन गंभीर बीमारियों में सरकार की तरफ से ज्यादा रिफंड या मोटी पैकेज राशि मिलती है, उन मरीजों को तुरंत और चुपचाप भर्ती कर लिया जाता है। इसके विपरीत, कम मुनाफे या छोटे पैकेज वाले मरीजों को ‘डॉक्टर उपलब्ध नहीं है’ या ‘बेड खाली नहीं है’ का बहाना बनाकर बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।
मजबूरी का फायदा उठाकर कैश काउंटर की तरफ मोड़ना: जब ग्रामीण क्षेत्रों से आए मरीज के परिजन गंभीर स्थिति में अस्पताल पहुंचते हैं और उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता, तो वे अपने मरीज की जान बचाने के लिए मजबूरी में ब्याज पर कर्ज लेकर महंगे नकद इलाज के लिए तैयार हो जाते हैं, जिससे अस्पतालों की तिजोरियां भरती हैं।
अस्पतालों की इस तानाशाही और मनमानी से बिलासपुर के स्थानीय नागरिकों में भारी आक्रोश है। ग्रीन पार्क निवासी प्रयास नामदेव का कहना है:
“निजी अस्पतालों की तुलना में सरकारी अस्पताल ही बेहतर हैं। निजी अस्पतालों में आयुष्मान कार्ड से इलाज कराना किसी बड़ी जंग को जीतने से कम नहीं है। वहाँ कदम-कदम पर गरीब मरीजों को प्रताड़ित और परेशान किया जाता है। अस्पताल प्रबंधन का मन होता है तो वे कार्ड स्वीकार करते हैं, नहीं तो मरीज को बाहर निकाल देते हैं।”
इसी तरह जरहाभाठा के रहने वाले मोनू शुक्ला का कहना है कि शहर के 10 प्रतिशत से अधिक अस्पतालों में नोटिस बोर्ड ही गायब हैं। कोई भी स्टाफ सही जानकारी देने को तैयार नहीं है, जिससे पूरी व्यवस्था वेंटिलेटर पर नजर आ रही है और इसमें तुरंत बड़े सुधार की जरूरत है।
इस पूरे महाघोटाले और अव्यवस्था के लिए जिले का स्वास्थ्य विभाग और आयुष्मान भारत योजना का संचालन करने वाली जिला स्तरीय मॉनिटरिंग टीम सीधे तौर पर जिम्मेदार है। मरीजों को समय पर सही लाभ मिल रहा है या नहीं, इसकी नियमित जांच करने की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों पर है, वे केवल दफ्तरों में बैठकर फाइलों की खानापूर्ति कर रहे हैं। सरकार द्वारा कड़े नियम और मापदंड निर्धारित किए जाने के बावजूद, निजी अस्पतालों पर उनका सख्ती से पालन नहीं कराया जा रहा है, जिसका खामियाजा गरीब जनता भुगत रही है।
इस गंभीर मामले पर संज्ञान लेते हुए बिलासपुर की मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. शुभा गरेवाल ने सख्त तेवर अपनाए हैं। उन्होंने कहा:”अस्पतालों द्वारा नियमों का उल्लंघन करना सीधे तौर पर मरीजों के मौलिक अधिकारों का हनन है। नियमानुसार, हर अनुबंधित अस्पताल को सभी पैकेजों और उपलब्ध इलाजों की सूची हिंदी भाषा में स्पष्ट अक्षरों में बोर्ड पर लगानी होगी। जिन भी अस्पतालों में निरीक्षण के दौरान यह सूची चस्पा नहीं पाई जाएगी, उन पर भारी अर्थदंड (जुर्माना) लगाया जाएगा। यदि दोबारा वही गड़बड़ी पाई गई, तो उस अस्पताल का आयुष्मान अनुबंध हमेशा के लिए रद्द करने की अनुशंसा राज्य नोडल एजेंसी को तुरंत भेज दी जाएगी।”
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