Sarguja News : छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में बस स्टैंड के समीप रिंग रोड से सटे एक प्राचीन जलस्रोत को मिट्टी डालकर भरने के मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के पार्षद आमने-सामने आ गए हैं। रविवार रात को शुरू हुए इस मिट्टी भराव कार्य ने शहर में बड़े राजनीतिक विवाद का रूप ले लिया है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों के पार्षदों ने इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है, जिसके बाद स्थिति की गंभीरता को देखते हुए नगर निगम और जिला प्रशासन ने तत्काल प्रभाव से भराव कार्य पर रोक लगा दी है।
घटनाक्रम की शुरुआत रविवार रात को हुई, जब स्थानीय लोगों ने देखा कि रिंग रोड के किनारे स्थित पुराने तालाब में जेसीबी और डंपरों के जरिए तेजी से मिट्टी डाली जा रही है। इसकी सूचना मिलते ही कांग्रेस पार्षद शुभम जायसवाल मौके पर पहुंचे। उन्होंने न केवल इस अवैध भराव का विरोध किया, बल्कि साक्ष्य के तौर पर वीडियो भी बनाया और प्रशासनिक अधिकारियों को इसकी जानकारी दी। यह तालाब रियासतकाल से अस्तित्व में बताया जा रहा है, जो स्थानीय पारिस्थितिकी और जलस्तर को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इस मामले में भाजपा पार्षद मनीष सिंह ने भी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। सिंह का आरोप है कि भू-माफिया इस ऐतिहासिक जलस्रोत को समतल कर प्लॉटिंग करने की फिराक में हैं। उन्होंने चिंता जताई कि अंबिकापुर में जलक्षेत्रों का दायरा लगातार सिकुड़ रहा है। वहीं, भाजपा पार्षद आलोक दुबे ने इस जमीन का संबंध कांग्रेस से जुड़े आजाद इराकी से बताते हुए आरोप लगाया कि इसमें दोनों ही बड़े दलों के रसूखदार लोग शामिल हो सकते हैं। दुबे ने तर्क दिया कि यदि कोई क्षेत्र वर्षों से जलस्रोत के रूप में अस्तित्व में है, तो उसे राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर पाटा नहीं जा सकता।
विवाद बढ़ने के बाद प्रशासन एक्शन मोड में आ गया है। अंबिकापुर एसडीएम फागेश सिन्हा के निर्देश पर तहसीलदार ने संबंधित जमीन को निजी स्वामित्व का बताते हुए भू-स्वामी आजाद इराकी को दस्तावेजों सहित कार्यालय में तलब किया है। तहसीलदार ने स्पष्ट किया है कि जब तक जमीन के दस्तावेजों की पूरी तरह से जांच नहीं हो जाती, तब तक वहां किसी भी प्रकार का निर्माण या भराव कार्य नहीं किया जा सकेगा।
अंबिकापुर का यह क्षेत्र प्राकृतिक जल निकासी और संचयन के लिए जाना जाता है। स्थानीय लोगों और पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि शहर के पुराने तालाबों को भरकर कंक्रीट के जंगल खड़े किए जा रहे हैं। यदि इस प्राचीन जलस्रोत को नहीं बचाया गया, तो भविष्य में शहर को भीषण जल संकट का सामना करना पड़ सकता है। फिलहाल, सभी की नजरें 20 अप्रैल को होने वाली तहसील न्यायालय की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां भू-स्वामी को अपनी जमीन के मालिकाना हक और उसकी प्रकृति (जलस्रोत या निजी भूमि) से जुड़े साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे।
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