False Tiger Moth
False Tiger Moth : झारखंड के घने और रहस्यमयी जंगलों ने एक बार फिर दुनिया को अपनी प्राकृतिक संपदा से चौंका दिया है। जमशेदपुर के निकटवर्ती क्षेत्रों में पहली बार एक ऐसी दुर्लभ पतंगे (Moth) की प्रजाति देखी गई है, जो अब तक इस राज्य के आधिकारिक रिकॉर्ड्स में दर्ज नहीं थी। वैज्ञानिकों और प्रकृति प्रेमियों के लिए यह खोज किसी चमत्कार से कम नहीं है, क्योंकि यह झारखंड की समृद्ध जैव विविधता में एक नया अध्याय जोड़ती है। इस खोज ने न केवल जीव विज्ञानियों का ध्यान खींचा है, बल्कि यह भी साबित कर दिया है कि झारखंड के वनों में अभी भी कई ऐसे रहस्य छिपे हैं, जिनका उजागर होना बाकी है।
यह महत्वपूर्ण खोज पश्चिमी सिंहभूम जिले के खूंटपानी ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले मतकमहातु क्षेत्र में हुई है। इस अनोखे जीव की पहचान वन विभाग के ‘एलिफेंट प्रोजेक्ट’ से जुड़े एक सतर्क फॉरेस्ट गार्ड, राजा घोष ने की। घने जंगलों और कल-कल बहती जलधाराओं के बीच इस पतंगे का दिखना इस इलाके की बेहतर पारिस्थितिकी (Ecology) का प्रमाण है। राजा घोष की इस तत्परता ने शोधकर्ताओं के लिए नए रास्ते खोल दिए हैं, जिससे अब इस क्षेत्र में कीट-पतंगों के संरक्षण और उनके आवास पर गहन अध्ययन की संभावनाएं प्रबल हो गई हैं।
इस दुर्लभ प्रजाति का वैज्ञानिक नाम डिस्फेनिया मिलिटारिस ($Dysphania\ militaris$) है, जिसे आम बोलचाल की भाषा में “फॉल्स टाइगर मॉथ” कहा जाता है। इस पतंगे की सबसे बड़ी विशेषता इसकी दिनचर्या है। जहाँ सामान्यतः पतंगे रात के अंधेरे में सक्रिय होते हैं, वहीं ‘फॉल्स टाइगर मॉथ’ दिन के उजाले में उड़ान भरता है। इसे मतकमहातु की एक जलधारा के पास सुबह के समय ‘मड-पडलिंग’ (नम मिट्टी से खनिज सोखना) करते हुए देखा गया। यह व्यवहार आमतौर पर केवल तितलियों में पाया जाता है, जो इस पतंगे को बेहद विशिष्ट और कौतूहल भरा बनाता है।
मतकमहातु का इलाका अपनी मिश्रित पर्णपाती वनस्पतियों और ऊबड़-खाबड़ भूभाग के लिए जाना जाता है, जो इस प्रजाति के लिए एक आदर्श घर है। इस पतंगे को इसके शारीरिक बनावट से आसानी से पहचाना जा सकता है; इसके पंखों पर सुनहरे पीले और गहरे बैंगनी-काले रंग का एक अद्भुत पैटर्न होता है। इतना ही नहीं, इसकी उड़ान शैली भी बहुत हद तक तितलियों से मेल खाती है। यही कारण है कि पहली नज़र में कई लोग इसे तितली समझने की भूल कर बैठते हैं। यह प्रकृति के उस हुनर का उदाहरण है जहाँ एक कीट दूसरे की नकल कर अपना अस्तित्व बचाता है।
इस खोज की महत्ता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि ‘जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया’ (ZSI) द्वारा प्रकाशित महत्वपूर्ण दस्तावेज ‘मॉथ ऑफ बिहार एंड झारखंड’ में भी इस प्रजाति का कोई जिक्र नहीं मिलता। इस खोज में दलमा वन्यजीव अभयारण्य के डीएफओ डॉ. अभिषेक कुमार और झारखंड जैव विविधता बोर्ड के अधिकारी हरिशंकर लाल का महत्वपूर्ण मार्गदर्शन रहा। अध्ययन के दौरान यह पतंगा अन्य सामान्य तितलियों जैसे ‘लाइम स्वालोवाटेल’ और ‘मोटल्ड ईमाइग्रेंट’ के साथ झुंड में देखा गया। यह खोज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर झारखंड के वन्यजीव पर्यटन और शोध को एक नई पहचान दिलाने में सहायक सिद्ध होगी।
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