Board of Peace 2026
Board of Peace 2026: डोनाल्ड ट्रंप की मेजबानी में 19 फरवरी को वाशिंगटन डी.सी. में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और रणनीतिक “बोर्ड ऑफ पीस” की पहली बैठक आयोजित होने जा रही है। इस वैश्विक शिखर सम्मेलन में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ भी शिरकत करेंगे। इस बैठक का प्राथमिक एजेंडा गाजा में युद्धविराम (सीजफायर) को न केवल लागू करना, बल्कि उसे भविष्य के लिए और अधिक मजबूत बनाना है। इसके अलावा, शांति प्रयासों को गति देने के लिए बोर्ड के लिए 5 अरब डॉलर के भारी-भरकम फंड की मंजूरी का रास्ता तलाशना और एक नए ‘ग्लोबल फोरम’ की विस्तृत रूपरेखा को अंतिम रूप देना इस चर्चा के मुख्य बिंदु रहेंगे।
इस बैठक का एक सबसे पेचीदा और संवेदनशील पहलू गाजा में ‘अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल’ (International Stabilization Force – ISF) की संभावित तैनाती है। प्रस्तावित योजना के अनुसार, ISF का मुख्य कार्य गाजा के पुनर्निर्माण वाले क्षेत्रों में सुरक्षा सुनिश्चित करना और वहां की प्रशासनिक व्यवस्था को संभालना होगा। पाकिस्तान की सरकार और सैन्य नेतृत्व के लिए यह मुद्दा अत्यंत गंभीर बना हुआ है, क्योंकि उनके सामने गाजा में अपने सैनिक भेजने का बड़ा सवाल खड़ा है। मुस्लिम देश एक स्वर में स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य का समर्थन कर रहे हैं और वेस्ट बैंक में इजरायली कब्जे का कड़ा विरोध कर रहे हैं, ऐसे में किसी भी सैन्य भागीदारी का निर्णय लेना पाकिस्तान के लिए कांटों भरी राह जैसा है।
‘बोर्ड ऑफ पीस’ की बनावट और इसके वास्तविक उद्देश्यों को लेकर अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। अमेरिका और ब्रिटेन में पाकिस्तान की पूर्व राजदूत मलीहा लोधी ने इस पहल की विश्वसनीयता पर चिंता व्यक्त की है। उनका तर्क है कि इस बोर्ड में फिलिस्तीनी प्रतिनिधियों का अभाव इसकी निष्पक्षता को संदिग्ध बनाता है। लोधी का मानना है कि पाकिस्तान को इस प्रक्रिया में शामिल होने से पहले इसकी संरचना और लक्ष्यों को पूरी तरह स्पष्ट होने देना चाहिए था। उन्हें डर है कि इस तरह की पहल से अनजाने में इजरायली कब्जे को ही अप्रत्यक्ष रूप से मजबूती मिल सकती है।
अमेरिकन यूनिवर्सिटी में इस्लामिक स्टडीज के प्रोफेसर अकबर अहमद के अनुसार, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की यह वाशिंगटन यात्रा केवल सैन्य बल भेजने तक सीमित नहीं है। शरीफ वर्तमान में एक तरफ अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय दबाव और दूसरी तरफ पाकिस्तान के भीतर के जटिल राजनीतिक समीकरणों के बीच फंसे हुए हैं। इमरान खान की गिरफ्तारी और उसके बाद उपजे राजनीतिक असंतोष के कारण शरीफ सरकार पहले ही रक्षात्मक मुद्रा में है। ऐसे में गाजा जैसे भावनात्मक मुद्दे पर कोई भी फैसला उनकी घरेलू राजनीति के लिए ‘करो या मरो’ जैसी स्थिति पैदा कर सकता है।
पाकिस्तान में गाजा और फिलिस्तीन का मुद्दा केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि गहरा भावनात्मक और धार्मिक महत्व रखता है। आम जनता में इजरायल के प्रति भारी रोष है। शरीफ जानते हैं कि यदि वह किसी भी ऐसे अंतरराष्ट्रीय बल का हिस्सा बनते हैं जिसे जनता ‘इजरायल समर्थक’ मान ले, तो देश के भीतर बड़ा विद्रोह भड़क सकता है। मुस्लिम जगत की यह स्पष्ट शर्त है कि वे किसी बल का हिस्सा तभी बनेंगे जब फिलिस्तीन को एक स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता मिलने का ठोस भरोसा मिले और उन्हें हमास जैसे समूहों के साथ सीधे सैन्य टकराव में न उतरना पड़े।
अंततः, शहबाज शरीफ के लिए वाशिंगटन की यह मेज एक अग्निपरीक्षा की तरह है। उन्हें एक तरफ अमेरिका के साथ अपने संबंधों को पटरी पर रखना है और दूसरी तरफ घरेलू जनमत व मुस्लिम देशों की भावनाओं का सम्मान करना है। डोनाल्ड ट्रंप के सख्त और अप्रत्याशित फैसलों के बीच अपनी बात मनवाना और पाकिस्तान के हितों की रक्षा करना शरीफ के लिए वर्तमान समय की सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौती है।
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