china us tariffs: अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा G-7 और नाटो देशों से चीन पर 50 से 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की अपील पर चीन ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। चीन ने इस मांग को “एकपक्षीय धौंस” और “आर्थिक दबाव” की नीति करार देते हुए चेतावनी दी है कि यदि इस पर अमल किया गया, तो वह जवाबी कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा।

क्या है मामला?
डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में बयान दिया था कि नाटो देशों को चीन पर भारी शुल्क लगाना चाहिए क्योंकि वह रूस से तेल खरीद रहा है। ट्रंप ने दावा किया कि इससे रूस को आर्थिक रूप से कमजोर किया जा सकता है और यूक्रेन युद्ध को जल्द समाप्त करने में मदद मिलेगी।

चीन का करारा जवाब
चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने सोमवार को प्रेस वार्ता में कहा कि, “रूस समेत किसी भी देश के साथ चीन का सामान्य व्यापार और ऊर्जा सहयोग पूरी तरह वैध और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुरूप है।” उन्होंने ट्रंप के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “अमेरिका का यह कदम एकपक्षीय दबाव और धौंस की नीति का हिस्सा है, जो न केवल अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों का उल्लंघन करता है बल्कि वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं की स्थिरता को भी खतरे में डालता है।”
समाधान संवाद से संभव: चीन
लिन जियान ने यह भी दोहराया कि यूक्रेन संकट के समाधान के लिए चीन का रुख स्पष्ट है — “समस्या का हल केवल संवाद और समझौते से ही संभव है, न कि टैरिफ और प्रतिबंधों से।” उन्होंने कहा कि “दबाव और धमकियों से कभी समाधान नहीं निकलता।”
G-7 और NATO क्या हैं?
G-7 यानी ग्रुप ऑफ सेवन, विश्व की सात प्रमुख औद्योगिक और विकसित अर्थव्यवस्थाओं — अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली और जापान — का समूह है। यह वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक नीतियों पर चर्चा और समन्वय के लिए एक मंच है।
वहीं, नाटो (NATO) — यानी उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन — एक सैन्य गठबंधन है जिसमें अमेरिका समेत 30 देश शामिल हैं। इसका उद्देश्य सदस्य देशों की सामूहिक सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
क्या होगी आगे की रणनीति?
अभी तक अमेरिका या उसके सहयोगी देशों ने ट्रंप के बयान पर कोई आधिकारिक निर्णय नहीं लिया है। लेकिन चीन की चेतावनी स्पष्ट है — यदि टैरिफ लगाए जाते हैं, तो वह भी पलटवार करेगा। इस बीच, स्पेन में अमेरिका और चीन के बीच चल रही व्यापार वार्ता पर भी इस विवाद का असर पड़ सकता है।चीन और अमेरिका के बीच तनावपूर्ण संबंधों के इस नए अध्याय ने वैश्विक व्यापार और भू-राजनीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले दिनों में G-7 और नाटो की स्थिति और अमेरिका की नीति पर दुनिया की निगाहें टिकी रहेंगी।
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