Next-Gen Solar Tech: सौर ऊर्जा को भविष्य की स्वच्छ ऊर्जा के प्रमुख स्रोतों में माना जाता है, लेकिन सोलर पैनल की दक्षता बढ़ाने के रास्ते में एक बड़ी चुनौती सूर्य की रोशनी का रिफ्लेक्शन है। पैनल की सतह पर पड़ने वाली धूप का एक बड़ा हिस्सा बिजली में परिवर्तित होने से पहले ही वापस परावर्तित हो जाता है। इससे उपलब्ध सौर ऊर्जा का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाता। अब वैज्ञानिकों ने इस समस्या के समाधान के लिए प्रकृति से प्रेरणा लेते हुए तितली के पंखों की संरचना का अध्ययन किया है।
तितली के काले पंखों में छिपा है खास डिजाइन
तितलियों के पंखों पर दिखाई देने वाले कई रंग सामान्य पिगमेंट की वजह से नहीं, बल्कि विशेष माइक्रोस्कोपिक संरचनाओं के कारण नजर आते हैं। इन्हें स्ट्रक्चरल कलर्स कहा जाता है। खास तौर पर काले पंखों वाली तितलियों के स्केल्स बेहद दिलचस्प होते हैं। इनकी सूक्ष्म बनावट सूर्य की रोशनी को प्रभावी ढंग से अवशोषित करने के साथ-साथ उसे अंदर फंसाए रखने में भी मदद करती है। यही विशेषता वैज्ञानिकों को सोलर तकनीक के लिए उपयोगी नजर आई।
चार प्रजातियों के काले स्केल्स का अध्ययन
रिसर्चर्स ने इस प्राकृतिक डिजाइन को समझने के लिए तितलियों की चार प्रजातियों के काले स्केल्स का अध्ययन किया। इनमें तिरूमला लिम्नियास, ग्राफियम डोसोन, पैपिलियो प्रोटेनर क्रेमर और ऑर्निथोप्टेरा प्रियामस शामिल हैं। वैज्ञानिक यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि इन तितलियों के पंखों की सूक्ष्म संरचना किस तरह प्रकाश को सोखती है और रिफ्लेक्शन को कम करती है।
ऑर्निथोप्टेरा प्रियामस के पंखों ने दिया खास संकेत
अध्ययन के दौरान ऑर्निथोप्टेरा प्रियामस के पंखों पर मौजूद संरचना विशेष रूप से महत्वपूर्ण पाई गई। इसके काले स्केल्स पर एक समान V-आकार के बेहद छोटे ग्रूव्स यानी खांचे मौजूद होते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह सूक्ष्म V-आकार की बनावट दृश्य प्रकाश के रिफ्लेक्शन को काफी कम करने में सक्षम है। कुछ परिस्थितियों में यह रिफ्लेक्शन केवल 1 से 5 प्रतिशत तक रह सकता है।
कंप्यूटर सिमुलेशन में सोलर पैनल पर किया परीक्षण
तितली के पंखों की इस प्राकृतिक संरचना को वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर सिमुलेशन के जरिए सिलिकॉन आधारित सोलर सेल की सतह पर एंटी-रिफ्लेक्टिव पैटर्न के रूप में जांचा। सामान्य स्थिति में सिलिकॉन की सतह से सूर्य की रोशनी का 35 प्रतिशत से अधिक हिस्सा रिफ्लेक्ट हो सकता है। तितली से प्रेरित माइक्रो-स्ट्रक्चर लागू करने पर सिमुलेशन में यह रिफ्लेक्शन घटकर 5 प्रतिशत से भी कम रह गया।
कम रिफ्लेक्शन का सीधा फायदा बिजली उत्पादन पर
सोलर पैनल पर पड़ने वाली जितनी अधिक रोशनी अवशोषित होगी, उतनी ही अधिक ऊर्जा को बिजली में बदलने की संभावना बढ़ेगी। ऐसे में यदि पैनल की सतह से रोशनी वापस जाने के बजाय अधिक मात्रा में सिलिकॉन के भीतर प्रवेश करे, तो ऊर्जा उत्पादन में सुधार हो सकता है। यही वजह है कि वैज्ञानिकों को तितली के पंखों से प्रेरित एंटी-रिफ्लेक्टिव डिजाइन भविष्य की सौर तकनीक के लिए काफी महत्वपूर्ण नजर आ रहा है।
सिमुलेशन में क्षमता 66 प्रतिशत तक बढ़ने का अनुमान
रिपोर्ट के अनुसार, कंप्यूटर सिमुलेशन में तितली से प्रेरित इस डिजाइन ने सोलर सेल की क्षमता में अधिकतम करीब 66 प्रतिशत तक सुधार की संभावना दिखाई। हालांकि, यह आंकड़ा वास्तविक परिस्थितियों में हासिल होने वाली दक्षता की गारंटी नहीं है। यह सिमुलेशन के आधार पर सामने आया संभावित अधिकतम प्रदर्शन है, इसलिए इसे व्यावहारिक स्तर पर साबित करने के लिए आगे परीक्षण जरूरी होगा।
असली दुनिया में परीक्षण के बाद सामने आएगी तस्वीर
वैज्ञानिकों के लिए अगला महत्वपूर्ण कदम इस माइक्रो-स्ट्रक्चर को वास्तविक सोलर सेल पर लागू करके उसका परीक्षण करना होगा। प्रयोगशाला और वास्तविक मौसम की परिस्थितियों में परिणाम अलग हो सकते हैं। तापमान, धूल, नमी, सतह की टिकाऊपन और बड़े पैमाने पर निर्माण जैसी चुनौतियां भी महत्वपूर्ण होंगी। इसलिए अभी यह तकनीक शुरुआती शोध और सिमुलेशन के चरण में है।
प्रकृति से प्रेरित तकनीक बदल सकती है सौर ऊर्जा
तितली के पंखों की सूक्ष्म संरचना पर आधारित यह शोध बायोमिमिक्री यानी प्रकृति से प्रेरणा लेकर तकनीक विकसित करने का एक दिलचस्प उदाहरण है। यदि वास्तविक परीक्षणों में इसके सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं और बड़े पैमाने पर इसका उत्पादन संभव होता है, तो भविष्य में सोलर पैनलों की दक्षता बढ़ाने में मदद मिल सकती है। इससे बिना अतिरिक्त धूप या जमीन बढ़ाए मौजूदा सौर तकनीक से अधिक बिजली हासिल करने की संभावनाएं मजबूत होंगी।
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