CG High Court : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (ASP) पद पर पदस्थापना से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) पात्र अधिकारियों की उपयुक्तता जांचने के लिए न्यूनतम बेंचमार्क तय कर सकती है। हालांकि, यह मानदंड सभी पात्र अधिकारियों पर समान रूप से लागू होना चाहिए। बेंचमार्क मनमाना, भेदभावपूर्ण या सेवा नियमों के विपरीत नहीं होना चाहिए। न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु की एकलपीठ ने WPS No. 4177/2026 में सुनवाई करते हुए डीएसपी माधुरी धिरही की याचिका खारिज कर दी।
2014 बैच की डीएसपी ने दायर की थी याचिका
याचिकाकर्ता माधुरी धिरही वर्ष 2014 बैच की सीधी भर्ती वाली डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस (DSP) हैं। वह वरिष्ठ वेतनमान में कार्यरत थीं और उन्होंने ASP पद पर विचार के लिए निर्धारित आठ वर्ष की अर्हकारी सेवा पूरी कर ली थी। इसके बाद दिसंबर 2025 में विभागीय पदोन्नति समिति की बैठक हुई, जिसमें उनके सेवा अभिलेख और वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन (ACR) का मूल्यांकन किया गया।
ACR के आधार पर घोषित हुईं ‘Not Fit’
DPC के मूल्यांकन के बाद याचिकाकर्ता को अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक पद पर पदस्थापना के लिए ‘Not Fit’ घोषित कर दिया गया। अधिकारी की ओर से अदालत में तर्क दिया गया कि उनके पिछले पांच वर्षों के ACR में चार बार ‘बहुत अच्छा’ और एक बार ‘अच्छा’ ग्रेड दर्ज था। इन ग्रेडिंग के आधार पर उन्हें कुल 14 अंक प्राप्त हुए थे।
15 अंकों के मानक को दी गई चुनौती
याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क था कि संबंधित सेवा नियमों में 15 अंकों का कोई न्यूनतम बेंचमार्क निर्धारित नहीं किया गया है। ऐसे में DPC द्वारा अपनी ओर से 15 अंक का अतिरिक्त मानदंड तय करना उचित नहीं माना जा सकता। उन्होंने इस बेंचमार्क को मनमाना बताते हुए अदालत से अपने मामले में राहत देने की मांग की।
राज्य सरकार ने याचिका का किया विरोध
राज्य सरकार की ओर से याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि किसी अधिकारी द्वारा निर्धारित अर्हकारी सेवा पूरी कर लेना अपने आप में पदस्थापना का अधिकार नहीं देता। पात्र अधिकारी को केवल पद के लिए विचार किए जाने का अधिकार मिलता है। अंतिम निर्णय अधिकारी के सेवा रिकॉर्ड, ACR और समग्र उपयुक्तता के मूल्यांकन के आधार पर DPC द्वारा लिया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने मांगा था बेंचमार्क का आधार
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने DPC द्वारा 15 अंकों का न्यूनतम बेंचमार्क निर्धारित किए जाने का आधार स्पष्ट करने के लिए अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (प्रशासन) से शपथपत्र मांगा था। अदालत यह जानना चाहती थी कि क्या निर्धारित मानदंड किसी अधिकारी विशेष को ध्यान में रखकर बनाया गया था या फिर सभी पात्र अधिकारियों के लिए समान रूप से लागू किया गया।
जिम्मेदारियों को ध्यान में रखकर तय हुआ मानक
अदालत के समक्ष पेश किए गए शपथपत्र में बताया गया कि अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक का पद महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों वाला है। पद की प्रकृति, अपेक्षित कार्यक्षमता और जिम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए DPC ने 15 अंकों को न्यूनतम उपयुक्तता मानक निर्धारित किया था। यह मानदंड सभी पात्र अधिकारियों पर समान रूप से लागू किया गया।
पात्रता से नहीं मिलता पदस्थापना का अधिकार
हाईकोर्ट ने छत्तीसगढ़ पुलिस कार्यपालिका (राजपत्रित) सेवा भर्ती एवं पदोन्नति नियम, 2005 के नियम 23 का उल्लेख करते हुए कहा कि पात्र अधिकारी को केवल अपने मामले पर विचार किए जाने का अधिकार प्राप्त है। पात्रता पूरी करने मात्र से अधिकारी को अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक पद पर पदस्थापना का स्वतः या निहित अधिकार नहीं मिल जाता।
DPC के मूल्यांकन में सीमित होगा न्यायिक हस्तक्षेप
अदालत ने कहा कि DPC एक विशेषज्ञ निकाय है और उसके द्वारा अधिकारियों की उपयुक्तता का मूल्यांकन किया जाता है। ऐसे मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप का दायरा सीमित रहता है। अदालत स्वयं DPC की जगह बैठकर किसी अधिकारी की योग्यता, मेरिट या सेवा रिकॉर्ड का दोबारा मूल्यांकन नहीं कर सकती।
मनमाने बेंचमार्क पर हो सकता है हस्तक्षेप
हाईकोर्ट ने हालांकि यह भी स्पष्ट किया कि DPC का विवेक पूरी तरह असीमित नहीं है। यदि किसी चयन समिति या DPC द्वारा तय किया गया न्यूनतम बेंचमार्क मनमाना, भेदभावपूर्ण, दुर्भावनापूर्ण या वैधानिक नियमों के खिलाफ पाया जाता है, तो अदालत न्यायिक समीक्षा के तहत उसमें हस्तक्षेप कर सकती है।
14 अंक होने से पदस्थापना नहीं मिली
इस मामले में अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता को कुल 14 अंक मिले थे, जबकि DPC ने सभी पात्र अधिकारियों के लिए 15 अंकों का न्यूनतम मानक तय किया था। अदालत के समक्ष ऐसा कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया जा सका, जिससे यह साबित हो कि समान स्थिति वाले किसी अन्य अधिकारी के साथ अलग व्यवहार किया गया।
पक्षपात और दुर्भावना का आरोप भी साबित नहीं
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता DPC की प्रक्रिया में किसी तरह की दुर्भावना, पक्षपात या मनमानी साबित करने में सफल नहीं हुईं। चूंकि 15 अंकों का मानक सभी पात्र अधिकारियों पर समान रूप से लागू किया गया था, इसलिए अदालत को इसमें भेदभाव का कोई आधार नहीं मिला।
हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका
सभी तथ्यों और रिकॉर्ड पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि DPC द्वारा निर्धारित 15 अंकों के न्यूनतम बेंचमार्क में हस्तक्षेप करने का कोई उचित आधार नहीं है। अदालत ने याचिकाकर्ता की दलीलों को स्वीकार नहीं किया और उनकी याचिका निराधार पाते हुए खारिज कर दी।
फैसले से पदोन्नति प्रक्रिया को लेकर स्थिति स्पष्ट
हाईकोर्ट के इस फैसले से यह स्पष्ट हुआ है कि विभागीय पदोन्नति समितियां पात्र अधिकारियों की उपयुक्तता जांचने के लिए न्यूनतम मानक निर्धारित कर सकती हैं। हालांकि, ऐसे मानदंड पारदर्शी, समान रूप से लागू और सेवा नियमों के अनुरूप होने जरूरी हैं। केवल निर्धारित योग्यता या सेवा अवधि पूरी करने से किसी अधिकारी को पदोन्नति अथवा पदस्थापना का स्वतः अधिकार प्राप्त नहीं होता।
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