Champat Rai Resignation : श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय द्वारा अपने पद से इस्तीफा दिए जाने की खबर ने देश भर में चर्चाओं को जन्म दिया है। उनके इस निर्णय के साथ ही राम मंदिर आंदोलन से जुड़े उनके दशकों पुराने संघर्ष, समर्पण और उस यात्रा पर फिर से विमर्श शुरू हो गया है, जिसने उन्हें इस महत्वपूर्ण ट्रस्ट के सबसे प्रमुख चेहरों में से एक बनाया। चंपत राय का नाम अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण के साथ पर्याय की तरह जुड़ा रहा है। उनके इस्तीफे ने लोगों के मन में यह उत्सुकता भी जगा दी है कि ट्रस्ट की बागडोर संभालने से पहले उनका जीवन और कार्यक्षेत्र कैसा था।

केमेस्ट्री प्रोफेसर से सामाजिक कार्यकर्ता तक का सफर
चंपत राय का प्रारंभिक जीवन एक अकादमिक पृष्ठभूमि से जुड़ा था। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के धामपुर स्थित आरएसएम डिग्री कॉलेज में केमेस्ट्री (रसायन विज्ञान) के प्रोफेसर के रूप में की थी। एक शिक्षक के तौर पर उन्होंने अपनी पहचान बनाई, लेकिन नियति को उनके लिए कुछ और ही मंजूर था। शिक्षण की दुनिया को छोड़कर उन्होंने समाज सेवा और संगठन को अपना सर्वस्व समर्पित करने का निर्णय लिया। उनका यह शैक्षणिक बैकग्राउंड इस बात का प्रमाण है कि कैसे एक बौद्धिक व्यक्ति ने समाज में परिवर्तन लाने के लिए अपने करियर का त्याग किया और एक अनुशासित सार्वजनिक जीवन अपनाया।

आपातकाल का दौर और जीवन का निर्णायक मोड़
वर्ष 1975 में भारत में लगी आपातकाल (इमरजेंसी) चंपत राय के जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े होने के कारण उन्हें कॉलेज से ही गिरफ्तार कर लिया गया था। उन्होंने लगभग 18 महीने जेल की कालकोठरी में बिताए। यह समय न केवल उनके संकल्प को परखने वाला था, बल्कि इसी दौरान उन्होंने यह सुनिश्चित कर लिया था कि अब वे वापस शिक्षण की ओर नहीं लौटेंगे। जेल से रिहाई के बाद, उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी को पूरी तरह त्याग दिया और पूर्णकालिक प्रचारक के रूप में संघ के कार्यों में जुट गए।
संगठन कौशल और विश्व हिंदू परिषद में बढ़ता कद
संघ के प्रचारक के रूप में कार्य करते हुए, चंपत राय ने कई बड़ी जिम्मेदारियां संभालीं। वर्ष 1991 में वे अवध क्षेत्र के क्षेत्रीय संगठन मंत्री के रूप में अयोध्या पहुंचे। इसके बाद उन्होंने विश्व हिंदू परिषद (VHP) में लंबी पारी खेली। वे केंद्रीय सचिव, संयुक्त महासचिव, अंतरराष्ट्रीय महासचिव और बाद में संगठन के उपाध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहे। प्रशासनिक कुशलता और रणनीतिकार के तौर पर उनकी साख ने उन्हें राम मंदिर आंदोलन की कानूनी लड़ाई का एक अनिवार्य हिस्सा बना दिया। अदालती कार्यवाही के दौरान ऐतिहासिक दस्तावेजों और सबूतों को जुटाने में उनकी भूमिका ने हिंदू पक्ष को मजबूती प्रदान की।
ट्रस्ट के महासचिव के रूप में विरासत
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद, 2020 में जब केंद्र सरकार ने 15 सदस्यीय ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ का गठन किया, तो चंपत राय को महासचिव चुना गया। यह चयन उनकी दशकों की तपस्या, आंदोलनों के प्रति निष्ठा और प्रशासनिक अनुभवों का परिणाम था। वे अशोक सिंघल जैसे वरिष्ठ नेताओं के करीबी रहे और मंदिर निर्माण की जटिल प्रक्रियाओं में उन्होंने कड़ी मेहनत की। चंपत राय का इस्तीफा एक महत्वपूर्ण अध्याय का समापन है, लेकिन राम मंदिर आंदोलन में उनका योगदान भारतीय इतिहास के पन्नों में सदैव स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज रहेगा।
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