Nepal Politics: नेपाल एक बार फिर राजनीतिक भूचाल से गुजर रहा है। 8 सितंबर को शुरू हुए हिंसक प्रदर्शनों के बाद सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया तेज हो गई है। ऐसे में देश को स्थायित्व देने के लिए पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में चुना गया है। हालांकि इस पर संवैधानिक सवाल खड़े हो रहे हैं, वहीं संसद भंग करने की मांग पर भी सियासी संग्राम जारी है।
जनता विशेषकर Gen-Z आंदोलनकारी और बालेन समर्थक गुट ने भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और राजनीतिक अस्थिरता के खिलाफ आवाज बुलंद की थी। प्रदर्शन ने उग्र रूप ले लिया और संसद भवन, प्रधानमंत्री निवास और कई नेताओं के घरों को आग के हवाले कर दिया गया। अब तक 20 से अधिक मौतों और 2000 से ज्यादा लोगों के घायल होने की पुष्टि हो चुकी है।
पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की का नाम अंतरिम प्रधानमंत्री के तौर पर तय कर लिया गया है। 11 सितंबर की रात राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने इसका ऐलान किया। हालांकि नेपाली संविधान के मुताबिक, रिटायरमेंट के बाद कोई मुख्य न्यायाधीश किसी सरकारी पद पर नियुक्त नहीं हो सकता। ऐसे में कानूनी विशेषज्ञों की नजर इस बात पर है कि संविधान का उल्लंघन किए बिना उन्हें किस प्रक्रिया के तहत प्रधानमंत्री नियुक्त किया जाएगा।
Gen-Z आंदोलनकारियों की प्रमुख मांग संसद भंग कर नए चुनाव कराने की है। इस पर ओमप्रकाश अर्याल ने औपचारिक प्रस्ताव भी रखा, लेकिन राष्ट्रपति पौडेल ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। उनका कहना है कि किसी भी स्थिति में संसद भंग नहीं होगी। कांग्रेस और एमाले (CNP-UML) ने भी राष्ट्रपति के रुख का समर्थन किया है।
सभामुख देवराज घिमिरे भी संसद बनाए रखने के पक्ष में हैं, जबकि माओवादी नेता पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ ने Gen-Z की सभी मांगों का समर्थन कर दिया है, जिससे सत्ता समीकरण और जटिल हो गए हैं।
फिलहाल देश में संवैधानिक एवं राजनीतिक असमंजस की स्थिति बनी हुई है। एक ओर अंतरिम प्रधानमंत्री के तौर पर सुशीला कार्की का नाम तय है, तो दूसरी ओर उनके नियुक्ति की वैधानिकता पर सवाल उठ रहे हैं। वहीं, संसद भंग करने और प्रत्यक्ष प्रधानमंत्री चुनाव प्रणाली को लेकर दलों के बीच गहरा मतभेद है।
देश की जनता, खासकर युवा वर्ग, अब बदलाव की राह पर अडिग दिख रहा है। देखना होगा कि नेपाल की राजनीतिक नेतृत्व इस जनाक्रोश को सकारात्मक दिशा में कैसे मोड़ता है।
नेपाल एक संवेदनशील मोड़ पर खड़ा है। जहां जनाक्रोश बदलाव की मांग कर रहा है, वहीं संविधान और राजनीतिक स्थिरता को बचाना भी एक बड़ी चुनौती बन चुका है। सुशीला कार्की की नियुक्ति और संसद के भविष्य पर होने वाले फैसले आने वाले दिनों में देश की दिशा तय करेंगे।
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